बेगार आंदोलन के 100 साल : ककोड़ाखाल को अभी भी है प्रेरणादायी स्मारक का इंतजार #mukhyadhara

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रमेश पहाड़ी

12 जनवरी 2021 उत्तराखंडी के लिए एक गौरवशाली दिन हैं। 100 वर्ष पूर्व आज ही के दिन ककोड़ाखाल में बेगार प्रथा के खिलाफ गढ़केसरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में दशज्यूला क्षेत्र के गाँवों के हजारों लोगों ने अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर पी. मेसन को बेगार न देकर, इस प्रथा के खिलाफ खुला विद्रोह किया था। ककोड़ाखाल में एकत्र आन्दोलनकारियों ने अंग्रेजी  सत्ता को चुनौती देते हुए अपने इरादे साफ कर दिए थे कि वे जान की बाजी लगाने समेत कोई भी दण्ड सहने को तैयार हैं, लेकिन बेगार जैसी गुलामी को स्वीकार नहीं करेंगे। आन्दोलनकारियों के बगावती तेवरों ने “अंग्रेजी साम्राज्य में कभी सूर्यास्त न होने” वाले बड़बोले शब्दों की गठरी भी बेगार के लिए आये सामानों की दर्जनों गठरियों के साथ लातों की ठोकर से पलट दीं थीं। अपर गढ़वाल की इस सत्ता-विरोधी लहर ने देश में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन को खास लोगों के साथ ही आम लोगों की भागीदारी का जनान्दोलन बनाने में सफलता प्राप्त की थी। इस आन्दोलन की बड़ी विशेषता यह रही कि जनता की ओर से हिंसा नहीं हुई। इस कारण डिप्टी कमिश्नर अपने परिवार तथा अधीनस्थों के साथ सुरक्षित निकल भागने में सफल रहा था। इसीलिए ककोड़ाखाल को स्वतंत्रता आन्दोलन के सिद्धपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।
ब्रिटिश गढ़वाल के ऊपरी हिस्से, जिसे अपर गढ़वाल के नाम से जाना जाता है, के लोग अपनी सादगी, वीरता, कर्मठता और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अन्याय के खिलाफ लड़ने की उनकी अदम्य क्षमता तथा नेतृत्व-शक्ति की अधिक चर्चा नहीं होती, जबकि इस मोर्चे पर वे देश के किसी भी क्षेत्र के लोगों से पीछे नहीं रहे हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन में अपर गढ़वाल के सपूतों द्वारा बढ़चढ़ कर भागीदारी की गई और बेगार प्रथा के खिलाफ एक जबर्दस्त जनान्दोलन खड़ा किया गया, जिसमें स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की तथा ब्रिटिश गुलामी की बेड़ियों को बहादुरी से तोड़ डाला।
इस कड़ी में सबसे प्रमुख आन्दोलन गौचर के समीप ककोड़ाखाल में बेगार प्रथा के खिलाफ गढ़केसरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में किया गया जनान्दोलन था, जिसने गढ़वाल में स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत बुनियाद तो रखी ही, ब्रिटिश नौकरशाही की चूलें भी हिला कर रख दीं। तब गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर पी. मेसन को अपने परिवार के साथ आधी रात को भागना पड़ा था।

गुलामी का कलंक थी बेगार प्रथा

गढ़वाल में बेगार की प्रथा राजशाहियों की गुलामी का विकृत स्वरूप बन कर उभरी। पहले राजा और उनके अहलकारों व अमलों की सेवा-सुश्रूषा बेगार के रूप में होती थी, जिसे 1804 से 1805 तक यहाँ रहे गोरखा राज ने अधिक नग्नता और क्रूरता के साथ पनपाया। गोरखा राज को हटाने के लिए जब राजकुमार सुदर्शन शाह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज से मदद माँगी तो उस समय स्थानीय स्तर पर उनकी मदद जनता से करवाने का आश्वासन भी दिया। गोरखों के अत्याचार से त्रस्त जनता ने भी इसे स्वीकार किया तथा अंग्रेजी फौजों का सामान ले जाने तथा उन्हें भोजनादि की सुविधा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसे बाद में ब्रिटिश नौकरशाही ने जनता का कर्तव्य और अपना अधिकार मान लिया। इसके अन्तर्गत ब्रिटिश अफसरों के दौरों में क्षेत्र के लोगों को एक पड़ाव तक सामान पहुँचाने, उनके आवास की व्यवस्था के लिए टेंटों और छप्परों की व्यवस्था करने तथा उनके भोजन के लिए खाद्यान्न, फल, सब्जी, दूध, घी, माँस आदि की निःशुल्क व्यवस्था करनी पड़ती थी।

कुली बेगार और कुली बर्दायश

बेगार प्रथा दो प्रकार से ली जाती थी। बिना मजदूरी लिए अफसरों, उनके मातहतों और थोकदारों-मालगुजारों के लिए काम करना ‘कुली बेगार‘ कहलाता था और बिना मूल्य के खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना कुली बर्दायश। चुली-कुली के नियम के हिसाब से जिन लोगों का खाना एक चूल्हे पर पकता था, उसे एक परिवार माना जाता था। अर्थात् एक चूल्हा तो एक कुली। यह प्रत्येक परिवार के लिए अनिवार्य था।
अफसरों के दौरों का कार्यक्रम पटवारियों के माध्यम से गाँव के थोकदारों-मालगुजारों के पास पहुंचता था और वे गाँवों की बारी लगाते थे। इसमें इतनी सख्ती बरती जाती थी कि कोई परिवार छूट नहीं पाता था। जिस परिवार में कोई पुरुष नहीं होता था, वहाँ महिला को बेगार निभाने जाना पड़ता था। गाँवों में कोई मर जाये तो उसकी अन्त्येष्टि रोक कर भी लोगों को बेगार में जाना पड़ता था।
चमोली के स्वतंत्रता सेनानी समिति के जिलाध्यक्ष स्व. शिव सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल का राजनीतिक इतिहास’ में इस क्रूर नियम का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘चुली-कुली के नियम के अनुसार उस स्त्री को भी बेगार देनी पड़ती थी, जिसका पति बाहर नौकरी पर हो या मर गया हो अथवा बीमार हो। सन 1917 में बीरोंखाल से लीसाखाल के सफर में उस स्त्री को भी 6-7 दिन बेगार करनी पड़ी थी, जिसको प्रसव हुए केवल 7 दिन हुए थे। भारी बोझ तथा भोजन व दवा के अभाव में उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था। ‘इसी प्रकार कुली बर्दायश में एक महिला पर दूध की फाँट लगाई गई, जबकि उसके पास कोई दुधारू पशु नहीं था। अंततः उसने अपने छह माह के दूध पीते बच्चे को भूखा रख कर, उसके हिस्से का अपने स्तनों का दूध लोटे में भर कर ‘साहब’ को पहुँचा कर बेगार दी थीं।
बर्दायश में मालगुजार ग्रामीणों पर प्रति परिवार के हिसाब से सामग्री निर्धारित करता था और परिवार को बिना किसी प्रतिवाद के उसे साहबों, उनके अमलदारों को पहुँचाना पड़ता था अन्यथा उन्हें आर्थिक दण्ड दिया जाता था, जो काफी कठोर होता था और उससे परिवार बुरी तरह टूट जाते थे।
इस अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी कठोरता से दबा दिया जाता था। अफसर, उनके अहलकार, उनसे उपाधि प्राप्त थोकदार, मालगुजार आदि द्वारा जनता से किए जा रहे इस अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत तब आई, जब बीसवीं सदी के आरम्भ में गाँधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा अंग्रेजी साम्राज्य की अत्याचारी नीतियों का क्रमबद्ध विरोध करते हुए स्वराज्य आन्दोलन को तेज किया गया तथा इसके साथ सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन आरम्भ किए गए। इससे मध्य हिमालय का यह हिस्सा भी अछूता नहीं रहा और यहाँ भी सामाजिक सुधार व आजादी के लिए विभिन्न गतिविधियां संचालित होने लगीं, जिसमें ऐडवोकेट अनसूया प्रसाद बहुगुणा जी और बैरिस्टर मुकुन्दी लाल जी ने मजबूत आधार तैयार किया।
श्री अनसूया प्रसाद बहुगुणा अदम्य उत्साही थे। अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए तो वे कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। वे कुमाऊँ में बेगार विरोधी आन्दोलन की रूपरेखा बनाने वाले लोगों में शामिल थे, जिसमें तय किया गया था कि 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर मेले में बेगार विरोधी आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा। वहां से लौटने के बाद बहुगुणा जी ने चमोली तहसील (वर्तमान चमोली जिला एवं रुद्रप्रयाग जिले की रुद्रप्रयाग तहसील) में व्यापक भ्रमण कर जन-जागरण आरम्भ कर दिया। इसी दौरान उन्हें पता चला कि गढ़वाल का डिप्टी कमिश्नर पी. मेसन चमोली तहसील के भ्रमण पर आ रहा है और वह पौड़ी से चल कर 12 जनवरी को ककोड़ाखाल में रात्रि वास करेगा तथा 13 जनवरी को कर्णप्रयाग पहुँच कर 14 जनवरी को वहाँ लगने वाले उत्तरायण मेले में शामिल होगा। इसके लिए पूरा सरकारी अमला तथा सरकार से पद-प्रतिष्ठा प्राप्त थोकदार-मालगुजार जी-जान से जुटे हुए थे।

ककोड़ाखाल का ऐतिहासिक आन्दोलन

कुशल रणनीतिकार श्री बहुगुणा बागेश्वर जाने के बजाय ककोड़ाखाल में डिप्टी कमिश्नर तथा उसके अमले को बेगार न लेने देने की योजना बनाई तथा इसके लिए पूरे क्षेत्र में व्यापक अभियान शुरू कर दिया गया। इसमें कुछ थोकदारों-मालगुजारों को शामिल करने में भी वे सफल हुए। ककोड़ाखाल में डिप्टी कमिश्नर अपने परिवार तथा अधिकारियों के साथ 12 जनवरी को दोपहर के समय पहुँचा, जहाँ कुछ तम्बू और छप्पर पहले से बना दिए गए थे और खाने-पीने का कुछ सामान भी एकत्र हो गया था लेकिन तुरन्त ही बहुगुणा और सारी के मालगुजार आलम सिंह बिष्ट के नेतृत्व में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग वहाँ पहुँच गए। बहुगुणा जी ने सामान के थैलों, टोकरों, बर्तनों को दोनों पैरों की ठोकरों से गिराना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सभी आन्दोलकारी भी ‘भारत माता की जय’, ‘बेगार प्रथा खत्म करो’ जैसे नारे लगाते हुए छप्परों-तम्बुओं को उखाड़ने लगे और बेगारियों को वापस लौटाने लगे। कुछ बेगारी जबर्दस्ती सामान लेकर कैम्प की तरफ बढ़ने लगे तो बहुगुणा जी रास्ते पर लेट गए। सरकारी अमले और उनके समर्थकों ने लोगों पर डंडे बरसाये तथा अनेक प्रकार से प्रतिरोध करने की काफी कोशिश की। बन्दूकों से 3 गोलियां भी चलाई गईं, लेकिन आन्दोलनकारियों के जोश के आगे उनकी एक न चल पाईं। यह देख कर डिप्टी कमिश्नर अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर ऊपर की तरफ एक झोपड़ी में चला गया और रात के अन्धेरे में डिप्टी कलक्टर चन्द्रा दत्त जोशी तथा अन्य अधिकारियों के साथ वहाँ से पैदल ही भाग गया।

12 जनवरी 1921 को ककोड़ाखाल में हुए इस बेगार विरोधी आन्दोलन, जिसमें मँगूदास और कालादास के ढ़ोल-दमाऊँ के साथ सभी वर्गों तथा गाँवों के लोग शामिल थे, की सफलता का सामाचार पूरे क्षेत्र और देश में फैला। उसके बाद लोगों की हिम्मत इतनी बढ़ी कि बेगार आन्दोलन जगह-जगह होने लगे। स्थान-स्थान पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता भी तैयार होते गए जो गाँवों में घूम-घूम कर बेगार न देने तथा जोर-जबर्दस्ती करने पर आन्दोलन की प्रेरणा देने लगे।
ककोड़ाखाल आन्दोलन में शामिल कार्यकर्ताओं में सारी के मालगुजार आलम सिंह बिष्ट की मालगुजारी तथा काण्डईं के थोकदार हयात सिंह नेगी की थोकदारी जब्त करने के अलावा 86 लोगों को सजा दी गई तथा दशज्यूला पट्टी के 72 गाँवों को 10 नम्बरी घोषित कर वहाँ किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता न देने का आदेश डिप्टी कमिश्नर ने जारी किया। सरकारी कारिन्दे और सरकार समर्थक लोग इन गाँवों के लोगों को राजद्रोही बताने से भी नहीं चूके और उनका बहिष्कार करने का फतवा देते रहे, लेकिन क्षेत्र की बहादुर जनता ने उसे स्वीकार नहीं किया।
उधर निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में पं. बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने पवित्र सरयू का जल लेकर बेगार न देने का संकल्प लिया तथा मालगुजारों ने बेगार के रजिस्टर सरयू में बहा दिए।
इन आन्दोलनों के बाद पूरे गढ़वाल और कुमाऊँ में बेगार विरोधी स्वर तेज होते चले गए। बेगार के खिलाफ विधान परिषद और विधान सभा में भी प्रस्ताव आते और खारिज होते रहे, लेकिन अंततः जनता के आक्रोश की खबरों ने सरकार को झकझोरा और उसने बेगार प्रथा समाप्त करने का निर्णय लिया।
उपेक्षा का दंश झेल रहा है स्वतंत्रता का सिद्धपीठ ककोड़ाखाल-
ककोड़ाखाल, जो वर्तमान में रुद्रप्रयाग जनपद की दशज्यूला पट्टी मेें ग्रामसभा नाग-ककोड़ाखाल के अंतर्गत हैं, अपर गढ़वाल में स्वतंत्रता आन्दोलन का एक सिद्धपीठ है, बेगार-विरोधी इस बड़े जनान्दोलन ने पूरे क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम को एक सशक्त आधार तो दिया ही, सामाजिक चेतना को भी एक नई दिशा प्रदान की। यह खेद का विषय ही है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के इस सिद्धपीठ औंर उसमें अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले हजारों ग्रामीणों तथा शहीद व सजा-प्राप्त लोगों के इस संघर्ष को एक प्रेरणादायी स्मारक बना कर उन्हे श्रद्धांजली देने के लिए स्वतंत्र भारत की सरकारों और उनके प्रशासन ने कोई मजबूत कदम नहीं उठाया। देश आजादी की हीरक जयन्ती मनाने की ओर अग्रसर है, लेकिन स्वतंत्रता के सिद्धपीठ को पहचान दिलाकर जन प्रेरणा-स्थल बनाने की दिशा में अभी तक कोई कार्य नहीं हो पाया है। जराजीर्ण भवनों में चल रहे एकमात्र हाईस्कूल और एक शिलापट्ट के अलावा यहाँ कुछ भी नहीं हैं। राज ही नहीं, समाज ने भी इस दिशा में कोई प्रभावी प्रयास नहीं किया है।
चिपको आन्दोलन के दौर में नैनीताल अग्निकाण्ड के सरकारी दुष्प्रचार के खिलाफ सच को सामने लाने के लिए चण्ड़ीप्रसाद भट्ट जी के नेतृत्व में निकाली गई नैनीताल से गोपेश्वर यात्रा का समापन ऐतिहासिक स्थल ककोड़ाखाल में करने के बाद स्थानीय जनता का ध्यान इस ओर गया। सफल बेगार आन्दोलन के 56 वर्ष बाद दिसम्बर 1977 के दूसरे सप्ताह में इन पंक्तियों के लेखक के सुझाव पर ककोड़ाखाल में आयोजित समारोह में पहली बार इस स्थान के साथ ही बेगार विरोधी आन्दोलन को भी नए शिरे से याद करनें का सिलसिला आरम्भ हुआ। इसके पश्चात् चमोली जिला स्वतंत्रता सेनानी समिति ने इस पर सक्रियता से कार्य आरम्भ किया।

समिति के अध्यक्ष शिव सिंह चौहान के प्रयासो से एक तथ्य-शोधक समिति ने इस क्षेत्र में पहुँचकर बेगार आन्दोलन में सम्मिलित रणबाँकुरों के परिजनों से पूछताछ कर इस पूरे आन्दोलन के तथ्यों को संकलित किया और उसे ‘‘गढवाल का राजनीतिक इतिहास” पुस्तक में प्रकाशित कर सार्वजनिक किया। चौहान जी के ही प्रयासों से देश की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयन्ती पर ‘‘जनपद चमोली में स्वतंत्रता संग्राम” नाम से एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई, जिसमें ककोड़ाखाल आन्दोलन का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया गया है।
ककोड़ाखाल को बेगार आन्दोलन के 100 वर्ष बाद और आजादी की हीरक जयन्ती मनाने की ओर अग्रसर देश से अभी भी अपेक्षा है कि इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय गौरव स्थल के अनुरूप विकसित करने की दिशा में ठोस कार्ययोजना बनाए और उसे धरातल पर उतारे।

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