2017 का विधानसभा चुनाव क्यों हारी कांग्रेस? इसका उत्तर तीन वर्षों से ढूंढ रहे हरीश रावत

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हां समय आ गया है

मेरे कुछ लेखों को पढ़ने के बाद कुछ दोस्तों ने मुझसे लगभग एक सा सवाल किया कि, इतना कुछ करने के बाद आप व आपकी पार्टी हारी क्यों? सत्यता यह है कि, मैं स्वयं लगभग तीन वर्षों से इस उत्तर को ढूंढ रहा हूॅ। इस ढूंढ में, मैं कभी अपनी सफलताओं व कभी अपनी विफलताओं पर मनन करता हूॅ और मन में उठ रहे भावों को लेखनीबद्ध करता हॅू। पिछले एक लेख में, मैंने अपने राज्य की तीन इंजिनियरिंग विंग्स की सफल विकास यात्रा को साझा किया था। इस बार मैं ऊर्जा क्षेत्र के तीनों निगमों पर कुछ बात करना चा हूंगा। आज तीनों निगम राज्य के कमाऊं पूत हैं। वर्ष 2013 में तीनों निगम घाटे में चल रहे थे। 2013 में राज्य के विद्युत उपभोक्ता को औसतन 16 घण्टे बिजली उपलब्ध थी। उपलब्धता की गुणवत्ता भी खराब थी। सामान्य उपभोक्ता से औद्योगिक उपभोक्ता अधिक परेशान थे। मैंने सत्ता सभालते ही पांच घोषणाएं की। प्रथम-वर्ष 2014 में 20 से 21 घण्टे व वर्ष 2015 व आगे 24 घण्टे लगातार अच्छी बिजली दी जायेगी। द्वितीय-विद्युत दर को न्यूनतम रखा जायेगा व हम देश में सबसे सस्ती बिजली बेचने वाले राज्य होंगे।

तृतीय-लाईन लाॅसेज (विद्युत चोरी) में 2 प्रतिशत की घटोत्तरी लायी जायेगी। चतुर्थ-आन्तरिक विद्युत उत्पादन में 2 वर्षों में 12 प्रतिशत की वृद्धि की जायेगी। पंचम-पिटकुल, विद्युत वितरण तंत्र को सुधारने के लिये आधा दर्जन 400 व 220, 132 व लगभग पचास 32 केवी. स्टेशन्स स्थापित करेगा, तांकि उपभोक्ताआंे को लगातार क्वालिटी विद्युत उपलब्ध हो सके। मुझे खुशी है, तीनों निगमों ने उपरोक्त लक्ष्यों को न केवल पूरा किया बल्कि घाटे से उभर कर ऊपर आये। मैंने विभाग से कहा कि, हमारा काम लक्ष्य निर्धारित करना तथा काम के लिये उचित वातावरण सृजित करना है। आन्तरिक संचालन में निगमों के निदेशक मण्डल को स्वायतत्ता दी जाय। मैंने निगमों के निदेशकों को कहा कि, अपने संगठन में सुव्यवस्था बनाये रखना व अपने सहयोगियों को विश्वास में रखना, उनका दायित्व है।

मुझे खुशी है कि, मेरे कार्यकाल में विद्युत क्षेत्र में निरन्तर औद्योगिक शान्ति रही। लाईन लाॅसेज में हम एक वर्ष में लगभग पौने दो प्रतिशत की कमी लाने में सफल रहे, यह देश भर में एक रिकार्ड है। यू.पी.सी.एल. देश में विद्युत कम्पनी के रूप में 21वें स्थान पर थी, परफोरमेन्स में आये सुधार के आधार पर उसे देश में चैथा स्थान प्राप्त हुआ। प्रथम तीन स्थानों पर गुजरात की विद्युत कम्पनियां रही। यह अपने आप में एक उल्लेखनीय उपलब्थि थी, जिसे यू.पी.सी.एल. लगातार बनाये रखे हुये है। पिटकुल भी वर्ष 2015-16 में लाभ कमाकर बी ग्रेड से ए ग्रेड कम्पनी बन गई और इस समय देश में इसकी रैंक तीसरी है। गुजरात व आन्ध्र के बाद पिटकुल है। जल विद्युत निगम ने भी 2 वर्ष लगातार अपने प्रोजेक्ट्स की उत्पादन क्षमता को सुधार कर, राज्य सरकार की प्रशंसा अर्जित की। मैंने प्रारम्भ में ही विद्युत क्षेत्र में एक ऊंचा लक्ष्य घोषित किया और अभिष्ठ साधन हेतु विभाग को लगातार अपने पास रखा। बिजली खराब तो सरकार का खाना खराब, इस कहावत को मैंने हमेशा ध्यान में रखा। नेशनल ग्रीड से से उत्तराखण्ड के लिए केवल एक सप्लाई लाईन उपलब्ध थी, मुजफ्फरनगर-पुहाना। राज्य की क्षेत्रफलीय विशालता को देखते हुये सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि, राज्य को निरन्तर व क्वालिटी सप्लाई मिलना कितना कठिन था। ग्रीड के हिटअप होने पर उत्तराखण्ड को घंटों बिजली नहीं मिलती थी। मैंने विभाग की पहली बैठक में महुवाखेड़ागंज में 400 के.वी. स्टेशन स्थापित करने व वाया बरेली से नेशनल ग्रीड से शीघ्र जोड़ने के आदेश दिये। पहाड़ी क्षेत्रों में विद्युत सप्लाई की निरन्तरता व क्वालिटी बनाये रखने हेतु ऋषिकेश व श्रीनगर में 400 के.वी. स्टेशन व श्रीनगर तथा शिमली में 132के.वी. के स्टेशन स्थापित किये गये। कुमाऊं सम्भाग में महुवाखेड़ागंज (काशीपुर) ट्रान्समिशन केन्द्र के अस्तित्व में आने के बाद पिथौरागढ़ क्षेत्र में अच्छी विद्युत सप्लाई की चुनौती बाकी रह गई थी। इस हेतु 132 के.वी. पिथौरागढ़ सब स्टेशन को 220 के.वी. सब स्टेशन से जोड़ा गया। इस कदम के फलस्वरूप इस क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति में 25 प्रतिशत का सुधार आया। इसी दौरान यमुनानगर से माजरा को भी जोड़ा। संकट के समय हमें एक और विद्युत श्रोत उपलब्ध हुआ। इन सब प्रयासों के फलस्वरूप पिटकुल अपने तंत्र से देश में सर्वाधिक अर्थात 99 प्रतिशत विद्युत उपलब्धता देने वाला संगठन बन गया। आज हमारे पास 220 के.वी. के 22 तथा 132 के.वी. के 18 सब स्टेशन हैं और हमारे पास एक रोबोस्ट सप्लाई तंत्र स्थापित है। देश में बिना पाॅवर टैरिफ बढ़ाये यू.पी.सी.एल. द्वारा अपनी आॅल इंडिया रेटिंग्स में बहुत बड़ा सुधार किया गया। आॅल इंडिया पाॅवर डिस्काम की रेटिंग्स में यह कम्पनी डेढ़ वर्ष में सी ग्रेड से ए ग्रेड पाने में सफल हुई। पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय बाधाओं के कारण बहुधा विद्युत सप्लाई बाधित होने की खबरें आती थी। मैंने इस स्थिति में सुधार लाने के लिए 33के.वी. के कई दर्जन सब स्टेशन स्थापित किये। आज उत्तराखण्ड के पास एक स्वस्थ विद्युत सप्लाई तंत्र उपलब्ध है। वर्ष 2014 में राज्य में भारी बर्फबारी हुई। राज्य के पर्वतीय भू-भाग में बड़े पैमाने पर विद्युत लाईनें क्षतिग्रस्त हुई। मुझे खुशी है कि, हम 18 घण्टे से 20 घण्टे के मध्य सभी प्रभावित गांवों में विद्युत सप्लाई को पुनः प्रारम्भ करने में सफल हुये। विभाग में आये नये जोश से यह सब सम्भव हुआ। नन्दा राजजात यात्रा, अर्द्धकुम्भ व चारधाम यात्रा के दौरान, बिना बाधा के विद्युत सप्लाई उपलब्ध करवाना, विभाग की एक बड़ी सफलता थी, जिसे मैं हमेशा याद करना चाहूंगा। श्री केदारनाथ धाम में बर्फबारी से निरन्तर विद्युत सप्लाई कई घण्टों तक बाधित रहती थी, उसे अण्डर ग्राउण्ड केवलिंग के जरिये सुधारा गया। हमने हर की पैड़ी में भी यही कार्य करवाया।
विद्युत आपूर्ति के साथ व्यवस्था सुधार हेतु 2 नये मुख्य अभियन्ता कार्यालय रूद्रपुर व हरिद्वार में दो नये सर्किल कार्यालय पिथौरागढ़ व टिहरी में खोले गये तथा डोईवाला, धारचूला व नारायण बगड़ में डिविजनल कार्यालय खोले गये। डिमाण्ड पर नये कनेक्शन व आॅन लाईन बिलिंग सेस्टम प्रारम्भ करवाया गया। प्रत्येक जिले में 24ग्7 काॅल सेन्टर खोले गये। इसी दौरान दो हजार किलोमीटर एल.टी. लाईनों को आधुनिक केवल सेस्टम से बदला गया। हमने हर सम्भव वितरण व्यवस्था को स्वस्थ व प्रभावी बनाया।
राज्य का अपना आन्तरिक विद्युत उत्पादन, 2013 की आपदा के कारण पूर्णतः गड़बड़ा गया था, उसे सुधारना व स्थापित विद्युत क्षमता में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करना, एक बड़ा लक्ष्य था। आज यू.जे.वी.एन.एल. ने गुणवत्ता पर्यावरण संरक्षण तथा सुरक्षा प्रबन्धन हेतु आई.एस.वो. 9001, आई.एस.वो. 14001 तथा 45001 का मार्क प्राप्त किया है। सन् 2015 में जोशियाड़ा सुरक्षा दीवार, धरासू परियोजना में आवश्यक सुधार कर हमने 25मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादित की व इसी तरह पथरी, मोहम्मदपुर, खटीमा, ढालीपुर, तिलोथ, चीला व ढकरानी में आर.एम.यू. अर्थात सुधारीकरण, आधुनिककरण व उच्चीकरण द्वारा इनकी विद्युत उत्पादन क्षमता को बढ़ाया गया। इनकी मशीनें वर्षों पुरानी थी, विश्व बैंक की सहायता से यह काम करवाया गया। शायद दो पाॅवर प्लान्टों में अब भी काम चल रहा है। ये योजनाएं आसन व डांकपत्थर की हो सकती हैं। धुनावों व उर्गम में भी यह सुधार कार्य चल रहा है या पूर्ण हो चुका है। मुझे खुशी है कि, मैं व्यासी परियोजना की आवश्यक गति देने में सफल हुआ है। यह योजना वर्ष 2020 के पूर्वाध में पूर्ण होकर राज्य को 120मेगावाट बिजली देगी, जो राज्य की बड़ी उपलब्धी है। इसी दौरान मध्येश्वर, कालीगंगा वन और टू तथा सुरिंगगाड़ भी पूर्ण हो जायेंगी और राज्य को 30मेगावाट और बिजली प्राप्त हो जायेगी। रामगंगा परियोजना पानी उपलब्धता में कमी के कारण अपनी क्षमता के मुकाबले मात्र 35 प्रतिशत विद्युत उत्पादित कर रही थी। उत्तर प्रदेश से बातचीत कर हमने जल उपलब्धता को बढ़ाया और यह योजना क्षमता के अनुरूप 75 प्रतिशत उत्पादन कर रही है। किशाऊ परियोजना को मैंने जल संसाधन मंत्री के रूप में नेशनल प्रोजेक्ट के रूप में स्वीकृति प्रदान की थी। मुख्यमंत्री के रूप में हिमाचल से बातचीत कर 660मेगावाट की इस विशाल बहुउद्वेशीय परियोजना को निर्माण हेतु किसाऊ निगम का गठन किया। इसी प्रकार लखवाड़ परियोजना भी सभी औपचारिकताएं पूर्ण कर केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के सम्मुख वित्तीय स्वीकृति हेतु लम्बित है। मैंने गन्ने के बगास आधारित प्लान्ट भी बाजपुर व नादेही के लिये स्वीकृत किये थे। मैं समझता हॅू, इन प्लान्टों में उत्पादन प्रारम्भ हो चुका होगा। विभाग से मैंने इसी दौरान डाकपत्थर व पथरी में दो सोलर प्लान्ट लगवाकर लगभग 30मेगावाट विद्युत उत्पादन बढ़ाया। विभाग की कार्यक्षमता में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हेतु मैंने निगम को सात सौ इंजिनियर, जूनियर इंजिनियर, कर्मी की भर्ती करने की अनुमति दी, तांकि निगम स्मार्ट बना रहे। उत्तराखण्ड का एक नारा था, ‘‘बिजली बेचेंगे-राज्य चलायेंगे’’, मैं नारे को कार्यरूप तो नहीं दे सका, परन्तु नारा पूरा होगा, इसकी एक मजबूत बुनियाद डालकर गया हॅू, इसका मुझे गर्व है।
मेरा फोकस रोजगार सृजन हेतु छोटी-2 विद्युत उत्पादन योजनाओं पर था। मैंने इस हेतु सूक्ष्म व लघु जल विद्युत उत्पादन नीति भी बनाई। मुझे दुःख है, इस नीति पर प्रभावी अमल नहीं हुआ। स्थानीय उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिये, बनाई गई इस नीति में श्री गुनसोला (टिहरी) के अलावा, मात्र कुछ ही लोगों ने रूची दिखाई। मैं चाहता हॅू, विद्युत उत्पादन, राज्य में व्यवसाय का स्वरूप ग्रहण करे। मैंने सोलर उत्पादन में राज्य का पदार्पण करवाया और आज राज्य कई सोलर प्रोजेक्ट्स के साथ राज्य सोलर इनर्जी के क्षेत्र में बहुत आगे है। मैं कुछ शब्द सरकार को खबरदार करते हुये लिखना चाहता हॅू, वह है इस क्षेत्र में किसी बड़े उत्पादक को एकाधिकार देने के खिलाफ। मैंने 2000 छोटे सोलर उत्पादकों ढुंढवाया, बील्ड एण्ड वाई तर्ज पर इन बेरोजगार नौजवानों को केवल अपनी छत या छोटा आंगन देना होता है। इस सरफेश पर लगा प्लान्ट, पांच सौ यूनिट तक बिजली पैदा करता है। विभाग ही यूनिट लगाता है व खरीदता है। उत्पादक को उसकी हिफाजत करनी होती है। इस योजना में आप घर बैठे बीस हजार रूपया सालाना कमा सकते हैं। मैं समझता हॅू, सरकार को इस योजना पर फोकस आगे बढ़ाना चाहिये तथा इस योजना में और सुधार लाने चाहिये।
हमारे राज्य में चार और इंजिनियरिंग शाखाएं हैं, आर.ई.एस., लघु सिंचाई, जल संस्थान व जिला पंचायत। मैंने, आर.ई.एस. को प्रभावी बनाने का प्रयास किया, जिसे अब छोड़ दिया गया है। लघु सिंचाई विभाग पिछले पचास वर्षों में जितना रूपया खर्च कर चुका है, धरती पर उतने सेन्टीमीटर भी विभाग ने सिंचाई की जगह नहीं बढ़ायी है। मैं भी कतिपय कारणों से लघु सिंचाई व पंचायतों के इंजिनियरिंग शाखा पर ध्यान नहीं दे सका। हाॅ जल संस्थान की कार्यप्रणाली में, मैंने काफी सुधार किये। खैर इन चैप्टरांे पर फिर कभी लिखूंगा। इस समय यह सब लिखने से मेरा लेख ज्यादा नीरस हो जायेगा। मैंने कुछ विभागों के साथ, हंसाने वाले प्रयोग किये, उन पर कुछ भूमिका स्वरूप जरूर लिखूंगा। मैं समझता हॅू, मेरे बाद बहुत समझदार, उद्वेश्यपूर्ण मुख्यमंत्री आयेंगे। जब उन्हें मेेरे विचित्र प्रयोगों की जानकारी मिलेगी तो जरूर हसेंगे। राजनीति में लोग बहुधा लोगोें को रूलाते हैं, मैं कुछ हंसने-हंसाने के अपने प्रयोगों को आपसे साझा कर रहा हॅू। यदि आपको पता चले कि, किसी मुख्यमंत्री ने वन विभाग को जंगल में मडुवा, कौणी, भट्ट, चैलाई आदि बोने के आदेश दिये थे, तो आप अपने मुख्यमंत्री की समझ पर सर खुजलाने के अलावा और क्या कर पायेंगे।

यदि आपको यह पता चले कि, एक मुख्यमंत्री लाल पूंछ वाले सियारों के दो ब्रिगिड फार्म खुलवा रहा है, तो आप ठाहाका मारकर हसंेगे। जिस दिन मैंने वन विभाग के उच्च अधिकारी को कहा कि, आप आम की गुठलियों, आंवले व कटहल के बीज व मेहल के गिरे पड़े दाने इकठ्ठा करें, उन्होंने सचमुच में अपना सर पीट लिया होगा। मुख्यमंत्री को कैसे समझाते कि, यह हमारी फाॅरस्ट्री का हिस्सा नहीं है। घर जाकर अपनी पत्नी से अवश्य कहा होगा कि, कैसे-2 लोग इतने बड़े पदों पर आ जाते हैं। अपने मंत्री से कह नहीं सकते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि उनके मंत्री को, मेरी समझदारी पर पर्याप्त भरोसा है। एक बार मैंने वन विभाग के अधिकारियों को बुलाया और उनसे कहा कि, आप चीड़ पैदा करना बन्द करिये। चीड़ की नई पौंध को वीड़ (खरपतवार) का दर्जा दीजिये। खैर चीड़ नर्सरी में पैदा न हो इस हेतु तो वे खुशी-2 तैयार हो गये, मगर स्वतः जंगल में पैदा चीड़ की छोटी पौंध को उखाड़ने के सवाल पर उन्हें पसीने छूट गये। बड़े नाट्कीय अंदाज में सभी बीगिज सर खुजलाने लगे। भारत सरकार भी बीच में आ गई, खैर मैंने उन्हें और परेशान करने के बजाय उनसे कहा कि, घिघांरू, किलमोड़ा, हिंसालु, मेहलु, मालू आदि-2 की पौंध पैदा करने की नर्सरियां तैयार करिये। श्री चन्दोला जो वरिष्ठतम विभागीय अधिकारी थे, उन्हें लगा कि चीड़ की पौंध उखाड़ने से तो इन झाड़-झंगवाड़ों की नर्सरी बनाना ज्यादा अच्छा है। उन्होंने एक कुशल अधिकारी की तर्ज पर सर हिलाना प्रारम्भ किया और सभी ने मेरे इस चमतकारिक आईडिया की तारीफ प्रारम्भ कर दी। मैंने, मन ही मन कहा, धन्य है नौकरशाही, तुझे सलाम। कुछ ने इन झाड़ियों के लताओं के अंग्रेजी नाम भी बताने प्रारम्भ किये, मगर किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि, माननीय यह तो स्वतः जंगल में उगते हैं। इनकी नर्सरी खड़ी करने की क्या जरूरत है।
मैं बहुधा देखता था कि, वन विभाग व वाईल्ड लाइफ विभाग वाले बड़े-2 अंग्रेजी नाम लेकर सचिवों को चुप करा देते हैं। एक दिन मैंने ऐसी ही एक बैठक में उन्हें सामूहिक रूप से छः काम सौंपे। 1. लच्छीवाला व भीमताल में तितली पार्क। 2. हरिद्वार व अल्मोड़ा में नर भक्षी गुलदारों की लैपर्ड सफारी प्रारम्भ करने। 3. छः बन्दर वाड़े हरिद्वार, टिहरी, अल्मोड़ा में प्रथम चरण में 3 बाड़े बनाने। 4. मरचूला में रैप्टाईल पार्क व मालसी में स्नैक पार्क। 5. दल्मोड़ी सहित 20 जंगलों में हिरन व खरगोश ब्रिडिग पार्क। 6. छः लाल लोमड़ी ब्रिगिंग फार्म। एजेण्डा विभाग के लिये कुछ ज्यादा अपाचनीय हो गया था। खैर जैसे-तैसे हामी भरकर विभागीय अधिकारियों ने मुझे धन्यवाद दिया और पल्ला छुड़वाया। जंगलों में बहुधा बहुत मेरी दिलचस्पी रही है। इस दिलचस्पी का उद्वेश्य एकेडमिक न होकर मात्र एक घुमन्तु का रहा है। उत्तराखण्ड के जंगल अपने विविधता के अनूठे नमुने हैं। हम इन्हें कैसे देख व समझ रहे हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। मैंने जंगलों के आत्मीय स्वरूप को बहुत निकट से देखा है। इसलिए मैं, जंगलों की स्वभाविकता के धीरे-2 खत्म होने से बहुत दुःखी हॅू। काफल, घिंघारू, तिमला, बेड़ू, मेहलु, मालू की लतायें, हिंसालू, गेठी, तेड़ू, यह सब मेरे प्रिय रहे हैं। वन विज्ञान में इनका पासिंग रेफरेन्स तो अवश्य आता होगा, मगर इन पर कुछ लिखा व पढ़ाया जाता होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता है। फिर अधिकारी जितना बड़ा, उतने बड़े-2 नाम याद रखना चाहेगा। ऐसे ऐरे-गैरे नाम कभी पढ़ें भी हों तो याद कहां रह जाते हैं। यह हमारे वन विभाग के अधिकारियांे का भाग्य था कि, उनका पाला एक ऐसे मुख्यमंत्री से पड़ गया। खैर मैं तारीफ करूंगा, वन विभाग के अधिकारियों ने मुझसे निभाई खूब। मैंने सबसे अधिक इनिसिएटिव इसी क्षेत्र में लिये। सर्वाधिक विभागीय बैठकें भी की, धीरे-2 विभाग मुझे समझने लगा। आज जब मैं, वन, वन्यजन्तु, वन-पंचायतें, पर्यावरण व पर्यटन पर लिखने को कलम उठा रहा हॅू, मेरे पास ढेर सारा इस क्षेत्र में लिखने को है। थोड़ा इंतजार करें।
(हरीश रावत)

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