पांच सौ शिक्षकों के दबाव में बेबस सरकार

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शिक्षकों के द्वारा केंद्रीय मंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक के दिल्ली दरबार में लगातार दस्तक देने और विधायकों के द्वारा उत्तराखंड सरकार पर दबाव के चलते 500 शिक्षकों की पहाड़ के विद्यालयों के लिए कार्यमुक्ति नहीं हो पा रही हैं।

बताते चलें कि पर्वतीय जनपदों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए तत्कालीन शिक्षा सचिव भूपिन्दर कौर औलख ने इन शिक्षकों के स्थानान्तरण निरस्त करते हुए इनको मूल संवर्ग में वापस भेजने के लिए 25 अप्रैल 2018 को आदेश जारी किया था और आदेश में स्पस्ट किया था कि इनको 31 मई 2018 तक प्रत्येक दशा में अपने मूल संवर्ग में वापस जाना है, लेकिन सरकार की लाचारी देखिये, अभी तक इन शिक्षकों की मूल संवर्ग हेतु कार्यमुक्ति नहीं हो पाई हैं।

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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का अनुमोदन और शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे के कई बार के दिये गए दिशा निर्देश भी धरे के धरे रह गए। इन शिक्षकों की सरकार और विभागीय अधिकारियों से सैटिंग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि इन शिक्षकों को सुगम स्थानों में बनाये रखने के लिए सरकार पहाड़ के नौनिहाल बच्चों की शिक्षा को भी दांव पर लगाने पर तुली है।

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सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम की ऐसी मजबूरी देखकर सवाल खड़े होते हैं कि आखिर वह पूर्व शिक्षा सचिव भूपिन्दर औलख के आदेश और उच्च न्यायालय के आदेश का पालन क्यों नहीं करा पा रहे हैं या फिर उन्हें किसी के द्वारा इसका पालन नहीं करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अकेले शिक्षा विभाग के हजारों केस उच्च न्यायालय नैनीताल में पहले से ही लम्बित हैं और न्यायालय का भी आदेश है कि पहाड़ के विद्यालयों में 70% शिक्षक अनिवार्य हैं, लेकिन सरकार इस मामले में उच्च न्यायालय की अवमानना करने से भी पीछे नहीं हट रही है।

इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा किये गए आदेश के अनुसार स्थान्तरण एक्ट के अनुसार केवल गम्भीर बीमार शिक्षकों और पति- पत्नी के दायरे में आने वाले शिक्षकों को ही रोका जा सकता है। बाकी सभी को वापस अपने मूल संवर्ग में जाना है।

अब इसको विडम्बना ही कहेंगे कि पहाड़ की जनता के द्वारा चुने हुए प्रितिनिधि ही जब पहाड़ को उजाड़ने पर तुल जाएं तो फिर बसने की फिक्र कौन करेगा। आज पहाड़ों से दिन प्रतिदिन शिक्षा और स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है और सरकारें इन सुविधाओं के देने की बजाए केवल कागजों में ही पलायन आयोग बनाकर एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर पहाड़ की चिंता की चिंता करने का नाटक कर रही हैं। आज पहाड़ के लगभग 3000 विद्यालय शिक्षकों को तरस रहे हैं और पहाड़ की जनता और मासूम बच्चे शिक्षकों की नियुक्ति के लिए रोज रोज आंदोलन करने को मजबूर हैं, वहीं पहाड़ के चिंतक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डा. निशंक जैसे प्रतिनिधि ही जब शिक्षकों को पहाड़ चढ़ने से रोकेंगे तो भला पहाड़ के विकास की उम्मीद और किससे की जा सकती हैं?

बहरहाल अब देखना यह होगा कि आखिर इन शिक्षकों की पहाड़ वापसी कब तक हो पाती है?

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