दु:खद खबर : गढ़वाली संस्कृति के पुरोधा जीत सिंह नेगी का निधन। गढ़वाली लोकगायकी के नींव के पत्थर थे नेगी

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जीवन शाह
देहरादून। गढ़वाली लोकगायकी के नींव के पत्थर संस्कृति के संवाहक रचनाकार गीतकार और सुरों के जादूगर जीत सिंह नेगी का आज शाम देहरादून स्थित आवास पर निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर से संस्कृति प्रेमियों और उनके चाहने वालों के बीच शोक की लहर दौड़ गई है।
जीत सिंह नेगी का जन्म पौड़ी गढ़वाल के पैडुल्स्यूं पट्टी में दो फरवरी 1927 को हुआ था। उनके कालजयी गीतों में से एक गीत ‘तु ह्वेली ऊंची डांड्यूं मां बीरा’ है, जो आज भी पुरानी पीढ़ी के लोगों की जुबां पर अनायास ही आ जाता है और उन्हें पहाड़ की उस परिकल्पना लोक में ले जाता है, जिसे उन्होंने अपने यौवन में कभी महसूस किया होगा।
वे वर्तमान में देहरादून धर्मपुर के हिम पैलेस के पास स्थित आवास में रहते थे। वहीं पर उन्होंने आज शाम इस दुनिया को अलविदा कहा और पहाड़वासियों के लिए लोक संस्कृति की ढेरों स्वप्निल यादें छोड़ गए।
जीत सिंह नेगी एक ऐसा नाम है, जो सही मायनों में गढ़वाली गीतों के नींव के पत्थर के रूप में जाने जाते हैं। उनसे पहले किसी ने शायद ही कल्पना की होगी कि गढ़वाल की संस्कृति को सुरों में भी पिरोया जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से उनके जमाने में रिकार्डिंग की सही व्यवस्था न होने के कारण उनके प्रारंभिक गीत रिकार्ड नहीं हो पाए। यह बात स्वयं किसी समय जीत सिंह नेगी ने इस संवाददाता को बयां की थी। तब अनुरोध करने पर उन्होंने ‘तु ह्वेली ऊंची डांड्यूं मां बीरा’ वाले गीत की दो-चार पंक्तियां भी गुनगुनाई थी।
भले ही उनके समय में संस्कृति के संरक्षण के लिए आज जैसी सुविधा संपन्न वाला माहौल न रहा हो, लेकिन कटु सत्य है कि वे अंतिम समय तक अपने लोक संस्कृति की धुन में रमे रहे। उनके सुप्रसिद्ध गीतों में से गीत गंगा, जौंल मगरी, छम घुंघुरू बाजला (गीत संग्रह), मलेथा की कूल (गीत नाटिका), भारी भूल (सामाजिक नाटक) समेत कई रचनाएं लोग कभी नहीं भूल पाएंगे।
उनके निधन से गढ़वाली संस्कृति को अपूर्णनीय क्षति हुई है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत अनेक गायकों, गीतकारों, कलाकारों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

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