हरेला : इन महत्वपूर्ण पहलुओं व सार्थक मानकों को ध्यान में रखकर ही मनाएं हरेला

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रमेश पहाड़ी

हरेला उत्तराखण्ड का लोक पर्व है। वर्षा के यौवन के साथ हरियाली की रंगत का यह पर्व धरती की बहुमुखी समृद्धि का दिग्दर्शक है। धरती का कोना-कोना जब नवजीवन का राग गाते हुए आगे बढ़ता है तो लोकमानस नवस्फूर्ति, नवोल्लास से भर जाता है। यह चौमासे की वह अवधि होती है, जब धरतीपुत्र अपने पुरुषार्थ की पराकाष्ठा से एक समृद्ध जीवन की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, वर्षा-मिट्टी-ताप और श्रम के सर्वोत्तम समन्वय से धरती को अर्थपूर्ण बनाते हैं, अपने भाग्य की रेखाएं अपने हाथों से स्वयं खींचने का सामर्थ्य पैदा करते हैं। इसी मौसम में श्रमशील समाज अपने श्रम का सर्वोत्तम प्रतिफल प्राप्त करते हैं।

हमारे समाजों ने प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने की तकनीकों को खोज और उन्हें जीवन व जीविका के साथ अभिन्न रूप से सम्बद्ध करने की परम्पराओं को संहिताबद्ध करते हुए लोक-व्यवहार में उतारा। प्रकृति से जितना प्राप्त किया, उसे वापस लौटाकर, उसकी समृद्धि को निरन्तर बनाये रखने की समझ को व्यवहार में उतारने का हरेला इसीलिये एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य पर्व है। श्रावण संक्रांति से धरती को हरियाली से परिपूर्ण करने का यह पर्व हरीश रावत सरकार ने धरती पर वानस्पतिक आवरण को गुणात्मक रूप में बढ़ाने के लिए आरम्भ किया था और इस दिन से सामाजिक सहभागिता को जोड़कर वृक्षारोपण का एक नियमित उपक्रम बनाया था। इन्हीं के प्रयास से यह सरकार का जनता के साथ मिलकर चलाया जाने वाला महत्वपूर्ण कार्यक्रम बन गया है। राज्य के सारे सरकारी विभाग इस दिन अन्य काम-धंधे छोड़कर वृक्षारोपण या इस सम्बन्धी उपक्रमों पर जुट जाते हैं। प्रकृति के संरक्षण का यह कार्यक्रम परिणामपरक बन पाया तो उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील भूभौतिकी वाले राज्य के लिए इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता।

आज़ादी के तुरन्त बाद ही 1952 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय वन नीति घोषित करते हुए वन क्षेत्रों में दो तिहाई और अन्य क्षेत्रों में एक तिहाई क्षेत्रों को वनाच्छादित करने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया था। उसके बाद वनीकरण की अनेक योजनाएं और कार्यक्रम संचालित कर इस लक्ष्य को पूरा करने के प्रयास आरम्भ किये गए। अलग-अलग नामों, परियोजनाओं और कालखण्डों में लाखों करोड़ रुपए तथा करोड़ों करोड़ मनुष्यों का श्रम इन पर खर्च करने के बाद भी उपलब्धि कुछ नहीं है। वह लक्ष्य तो दूर, हमारा वन-क्षेत्र और वनों की सघनता कम हुई है। ऐसे में प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं कि जब धन और श्रम पूरा खर्च हो गया है तो उपलब्धि शून्य क्यों है? इसका सबसे बड़ा कारण है- उत्तरदायित्व का अभाव। पूछने पर कार्यदायी संस्थायें अँगुली ऊपर, ऊपर से और ऊपर करते हुए इतने ऊपर पहुँचा देती हैं कि वहाँ से मौन के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल पाता।

सरकार करदाताओं के पैसे से चलती है। सरकार पैसा खर्च करती है तो पूर्ण उत्तरदायित्व उसी का है कि वह बताए कि धनराशि खर्च होने के बाद उसके परिणामों के प्रति जिम्मेदार लोग बच कैसे जाते हैं? लेकिन यह उत्तर माँगना भी असम्भव बना दिया गया है। पहले आदिवासी-वनवासी लोग जो काम करते थे, उसके परिणाम प्रत्यक्ष दिखाई देते थे लेकिन उन्हें गँवार, अज्ञानी मानने वाले विशेषज्ञों की पल्टन के साथ उतरे सरकारी विभाग असफल क्यों हैं, इसे समझने की आवश्यकता है।

वृक्षारोपण की संख्या निर्धारित करते हुए उनके जीवित बचे रहने का न्यूनतम प्रतिशत तय कर उसके लिए कार्यदायी संस्था की जिम्मेदारी तय न करना इन वृक्षारोपण कार्यक्रमों का एक बड़ा झोल है, जिसे बड़े नौकरशाह बड़ी चतुराई से स्वयं को बचाने के लिए रचते हैं। कमजोर राजनीतिक इच्छा-शक्ति की सरकारें उन पर कोई नियंत्रण नहीं रख पातीं और तमाम नियंत्रक व नियामक संस्थान इसमें गहरे उतरने को तैयार अथवा सक्षम नहीं बन पाये हैं। यह क्यों नहीं हो सकता कि प्रोजेक्ट बनाने वाले, उसके लाभ गिनाने वाले, बड़े बजट ठिकाने लगाने की योजना गढ़ने वाले विशेषज्ञ और कार्यदायी संस्थाओं पर रोपे गए पौधों का एक सर्वमान्य जीवित प्रतिशत निर्धारित करते हुए, उसकी सफलता का मानक तय कर दिया जाये और उसकी प्रतिपूर्ति सुनिश्चित करने का प्राविधान प्रोजेक्ट रिपोर्ट में ही जोड़ दिया जाय? उसके हिसाब से सभी की जिम्मेदारी तय कर उनसे वसूली की सख्त कार्यवाही की जाय?

पिछले 20 वर्षों में किये गए वृक्षारोपण के कार्यों की गहन जाँच कर दी जाये कि जंगलों में कितने पेड़ लगे, बचे और उस खर्चे से कार्यदायी संस्थाओं के कारिंदों ने कस्बों-शहरों में सीमेंट-कंकड़ के कितने जंगल अपने लिए उगा दिए हैं तो सच्चाई सामने आने में देर नहीं लगेगी। खेद तो यह है कि इसमें बड़ी पहुँच वाले लोगों के अपने स्वार्थ भी जुड़े हैं। व्यवस्थाजनित भ्रष्टाचार के इन हमामों में अधिसंख्य लोग नंगे नजर आ जायें तो आश्चर्य नहीं होगा!

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