एक्सक्लूसिव : आखिर रुद्रप्रयाग के काश्तकार ने माल्टा से लकदक सैकड़ों पेड़ काटने का क्यों लिया निर्णय! पढ़़िए पूरी खबर #mukhyadhara

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सत्यपाल नेगी/रुद्रप्रयाग

यूं तो प्रदेश में उद्यान विभाग द्वारा काश्तकारों के लिए अनेक योजनाएं लांच किए जाने का दावा किया जाता है, किंतु काश्तकारों को अपनी उपज बेचने के लिए खरीददार न मिलने के कारण उनके सम्मुख रोजी-रोटी का संकट गहरा रहा है। ऐसे ही एक हताश दिव्यांग काश्तकार ने फरवरी मेें अपने सैकड़ों माल्टा के पेड़ काटने का निर्णय लिया है।
जी हां! कटु सत्य है कि जंगली जानवरों से बची-खुची खेती के लिए भी बाजार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, ऐसे में खेती-किसानी पर आधारित आजीविका पर संकट मंडराने लगा है। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी पैदा की गई उपज को बेचने के लिए जब उत्तराखंड के पहाड़ी काश्तकारों को बाजार नहीं मिल पा रहा है तो उनकी मेहनत पर पानी फिर रहा है। ऐसे में काश्तकारों के सम्मुख निराशा के बादल मंडरा रहे हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि यही स्थिति पलायन के लिए भी मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

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यहां बात की जा रही है पर्वतीय क्षेत्रों में उगाए जाने वाले माल्टा की। उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों के ऊंचाई वाले इलाकों में इन दिनों माल्टा के बेहद सुंदर व खूबसूरत फल बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। किसान वर्षभर की अपनी फसल को तैयार करने के बाद उसकी बिक्री का इंतजार करते हैं। सोचते हैं अब इसी फसल को बेचकर उनकी सालभर की आजीविका चलेगी, लेकिन जब वह खेतों में ही पड़ा-पड़ा सड़ रहा है तो फिर किसानों को स्वयं के भाग्य पर पछताने के सिवाय और कुछ नहीं है।
बताते चलें कि जनपद रुद्रप्रयाग के ग्राम औरिग भीरी में भी आजकल माल्टा के पेड़ अपनी केसरिया छटा बिखेरे हुए खरीददारों का इंतजार कर रहे हैं।

आइए यहां के हताश व निराश कृषक की दुखद कहानी आपके सम्मुख बयां करते हैं:-

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रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम औरिंग निवासी 89 वर्षीय काश्तकार अजीत सिंह कण्डारी व उनके पुत्र ठाकुर सिंह (दिव्यांग) ने अपने खेतों के लगभग 200 माल्टा के पेड़ आगामी एक फरवरी से काटने का कड़ा निर्णय लेना पड़ा। यह कठोर निर्णय आखिर उन्हें क्यों लेना पड़ा, इसके पीछे की कहानी भी आपको समझानी आवश्यक है।
दरअसल, अजीत सिंह ने 1960 के दशक में नगदी फसल बोने व उद्यान को बढ़ावा देकर बिना चकबंदी के माल्टा, मौसमी, नींबू प्रजाति के अन्य पेड़ अपने हिस्से के लगभग एक हैक्टेयर बिखरी जोत पर असिंचित भूमि में लगाए। इसके अलावा वह स्ट्राबेरी, मूँगफली, सूरजमुखी चायपत्ती, सोयाबीन, मटर व अन्य दालों व विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते हैं। कुछ वर्षों पूर्व वह 200 पेड़ उद्यान विभाग अगस्तमुनि से लेकर आए और उन्हें भी अपने खेतों में लगा दिया। तैयार फलों को ए ग्रेड व बी ग्रेड सैकड़ा के हिसाब से लगभग 50 हजार रुपए का प्रतिवर्ष स्थानीय बाजार व रुद्रप्रयाग में इनके पुत्र समाजसेवी व गढ़वाल वेलफेयर समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह कण्डारी द्वारा बेचा जाता है, जो कि वर्तमान में किशोर न्याय बोर्ड रुद्रप्रयाग व चमोली के सदस्य है, लेकिन इस बार अजीत सिंह और उनके परिवार के सम्मुख बड़ी निराशाजनक स्थिति खड़ी हो गई, जब इस बार उनकी फसल का एक दाना भी नहीं बिक पाया है। हैरानी की बात यह है कि बाजारों में जहां किन्नू व संतरा भरा पड़ा है, किंतु शुद्ध माल्टा के लिए खरीददार नहीं मिल पा रहे हैं।

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सवाल यह है कि जो उद्यान विभाग आजीविका बढ़ाने के लिए काश्तकारों को पेड़ बांटते समय खूब वाहवाही बटोरता है, क्या विभाग को काश्तकारों द्वारा तैयार फसल के लिए बाजार की उपलब्धता पर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या विभाग को फसल तैयार होते समय उनकी सुध नहीं लेनी चाहिए? हताश किसानों की स्थिति यह है कि वे अपने समान को पानी के भाव नीलाम करने को मजबूर हैं। यदि वह अति सस्ती दरों पर अपना माल नहीं बेचते हैं तो फिर उनकी उपज पक्षियां, बंदर आदि खा जाते हैं या फिर वह पेड़ों पर ही सड़ जाते हैं। जिससे किसानों की सालभर की मेहनत पर पानी फिर जाता है और उनके सम्मुख सालभर आर्थिक संकट बना रहता है।

किसानों की स्थिति को देखते हुए सवाल उत्तराखण्ड सरकार पर भी खड़े होने स्वाभाविक है कि आखिर किसानों की अनदेखी क्यों की जा रही है। सवाल जिला प्रशासन पर भी खड़े होते हैं कि कागजों व विज्ञापनों में जिस प्रकार किसानों के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं जमीनी हकीकत स्वयं मौजूदा हालात बयां कर रहे हैं। ऐसे में किसान इतनी हाडतोड़ मेहनत करने से धीरे-धीरे पीछे हटने लगेगा और यही स्थिति आगे चलकर पलायन का कारण बनेगी।
बताते चलें कि पहाड़ों के लिए माल्टा एकमात्र ऐसा फल है, जिसका शानदार उत्पादन हो रहा है और वह छोटे काश्तकारों के लिए आजीविका का सशक्त साधन बन सकता है।
बहरहाल, सरकार को चाहिए कि उपरोक्त ज्वलंत समस्या का शीघ्र संज्ञान लेकर किसानों की इस बड़ी समस्या का समाधान करना चाहिए। अन्यथा चुनावी मौसम में सरकार को ही जनता के बीच इन सवालों के जवाब देने के लिए भी तैयार रहना होगा!

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