उत्तराखण्ड : गुलदार के बढ़ते हमलों से किस तरह बज रही खतरे की घंटी, आप भी पढ़़िए यह विशेष रिपोर्ट

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उत्तराखंड के वन बाहुल्य इलाकों से लगी मानव बस्तियों में भी खूंखार जानवरों के लगातार मंडराने और मौका पाकर इंसान को मौत के घाट उतारने की बढ़ती घटनाओं ने इनके व्यवहार में बदलाव के संकेत दिए हैं, जिस पर नियंत्रण के लिए यदि कारगर उपाय वक्त रहते नहीं किए गए तो मानव-वन्य जीव का यह संघर्ष जंग जैसे हालात में तब्दील हो सकता है।

संवाददाता/देहरादून

लगभग सौ वर्ष पहले (सन् 1926) के उत्तराखंड क्षेत्र के गढ़वाल और कुमाऊं में हिंसक वन्य पशुओं व मानव के आपसी संघर्ष की झलक प्रकृतिवादी जिम कार्बेट के लेखों व किताबों से बखूबी मिलती है। रुद्रप्रयाग क्षेत्र में 125 से ज्यादा लोगों को अपना निवाला बना चुके खूंखार बाघ को मारकर जिम कार्बेट ने लोगों को भय से मुक्ति दिलाई थी। जिम कार्बेट ने गढ़वाल और कुमाऊं में कई नरभक्षी बाघों या गुलदारों को मारने में सफलता हासिल की थी। एक शताब्दी के गुजरे कालखंड में सभ्य होते मनुष्य ने अनियोजित विकास और मुनाफे की हवस में जंगली जानवरों से मनुष्य की स्वाभाविक दूरी को पाटने का ही काम नहीं किया, बल्कि आर्थिक फायदे के लिए जंगली जानवरों का बड़े पैमाने पर शिकार भी किया। परिस्थितियों में बदलाव से मनुष्य और जंगली जानवर दोनों एक-दूसरे के आवास क्षेत्रों में घुसने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं। जिसका नतीजा आज उनमें हर दिन भिड़ंत की घटनाएं हैं। इन घटनाओं में हिंसक प्रवृत्ति के जंगली पशु मनुष्यों के लिए मुश्किल पैदा करने लगे हैं। प्रकृति के नायाब जीव, खाद्य श्र्ृंखला के अहम किरदार जानवर जैसे बाघ, लेपार्ड, शेर, हाथी आदि की संख्या खतरे की सीमा तक घटते जाने से चिंतित सरकारों ने वन महकमा बनाया और कई कठोर वन कानून से लेकर वन्य जीव संरक्षण एरिया और हजारों करोड़ रुपए से चलाए जाने वाले टाइगर प्रोजेक्ट से स्थिति पर नियंत्रण करने का विकल्प चुना, पर ऐसा वास्तव में हो क्यों रहा है, उसका कारण जानकर उसे बदलकर सही दिशा देने की जहमत बहुत कम उठाई।

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उत्तराखंड में आज 24678 वर्ग किमी. ( प्रदेश के कुल भौगोलिक खेत्रफल का 46 प्रतिशत) भूभाग वन क्षेत्र के अन्तर्गत होने के बावजूद जंगलों में रहने वाले जंगली जानवर शिकार की तलाश में मानव बस्तियों में मंडराने और बसेरा कर रहे हैं, जो कि परस्पर दो विरोधी स्थितियां हैं। सामान्यतः जंगली जानवरों के लिए वन विभाग के नियंत्रण का भूभाग उनके बसेरा करने, भोजन हासिल करने और प्रजनन के लिए पर्याप्त होना चाहिए था पर वास्तविक स्थिति उल्टी है। बाघ, तेंदुआ जैसे जंगलों में अन्य जानवरों का शिकार करने वाले खूंखार पशु जो मानव से दूर रहने में सुरक्षा महसूस करते हैं, अब बस्तियों में ऐसे घूमने लगे हैं, जैसे सियार घूमा करते हैं, खासकर तेंदुए या गुलदार के व्यवहार में यह बदलाव देखा जा रहा है। जंगलों या वनों की बहुतायत के चलते राज्य सरकार को देश-विदेश के पर्यावरण संरक्षण मंचों पर शाबाशी मिलती है और राज्य सरकार इन्हीं के दम पर ग्रीन बोनस का दावा करती है, पर वनों से वन्य जीव बाहर निकलकर लगातार मानव बस्तियों में जा रहे हैं, जहां मानव को जान-माल की क्षति पहुंचाने के साथ वे खुद भी मौत के मुंह में आते जा रहे हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता होगा, जब मीडिया में वन्य प्राणी के साथ मानव के टकराने का समाचार न दिखाई देता हो। जंगली जानवरों से वनों के आस-पास बसे लोगों की जान, उनके जानवरों और खेतीबाड़ी की सुरक्षा कैसे की जाएगी इस बारे में सरकार का रवैया असंवेदनशील है। बंदर और सूअर किसानों की मेहनत को रौंद रहे हैं और मानव शरीर को भी हानि पहंुचा रहे हैं। सरकार और उसका वन विभाग इस बारे में विरोध की आवाज उठने पर बयान से लेकर कागज-पत्र दौड़ा रहे हैं, सेमिनारों में विचार-विमर्श की रिहर्सल हो रही है, पर जमीन पर कुछ कारगर योजना नहीं दिखती है। सबसे अधिक हैरान-परेशान करने की स्थिति यह है कि गुलदार-बाघ हर साल दर्जनों व्यक्तियों को मौत के घाट उतारने पर लगा है, पर यह कोई बताने को राजी नहीं कि आखिर इन आदमखोर होते जंगली जानवरों से लोगों की जान कैसे बचाई जाए। बच्चे, युवा, वृद्ध पुरुष और स्त्री दोनों गुलदारों के आक्रमण के शिकार हुए हैं। चौके-चूल्हे, गोशाला, खेत-खलिहान में, चारा-लकड़ी लाने में और रास्तों से आवागमन में गुलदार ने लोगों पर हमला किया है।
जाहिर है उसके आक्रमण की जद से घर के बाहर कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है। गुलदार-बाघ के हमले के मामले पर्वतीय क्षेत्र में ग्रामीण इलाकों में ज्यादा हो रहे हैं। जंगली जानवरों से मनुष्य की हिफाजत का सवाल उत्तराखंड के पहाड़ों में आज इतना तीव्र हो चुका है कि इसे टालना खतरनाक है। मनुष्य और जंगली जानवर में संघर्ष की स्थिति को तीव्र होने से कैसे बचाया जाए, इसके लिए फौरन कारगर योजना का क्रियान्वयन होना जरूरी हो गया है, असली फोकस जंगल के हिंसक प्रवृत्ति के पशु को जंगल में ही रोकने पर होना चाहिए, जिस पर वन विभाग कभी भी ज्यादा जोर देने से कतराता है। वन महकमे के अधिकारियों के पास दूसरे समाधान जरूर हैं, पर जंगल में ही रोक कर वन्य पशुओं का मंगल करने का कोई भी व्यावहारिक रास्ता नहीं दिखाई देता।
चिंताजनक हो गई है स्थिति
मानव-वन्य जीव संघर्ष ने उत्तराखंड को पूरे देश में चर्चा का विषय बनाया है। बाघ, तेंदुआ, जंगली हाथी व सूअर मानव की जान को खतरा बन रहे हैं, खासकर तेंदुआ जिस पैमाने में पर्वतीय क्षेत्र के गांवों व संरक्षित वनों के पास के अर्द्धशहरी बस्तियों में मानव पर आक्रमण कर रहा है, वह दहशत का कारण बन गया है। उत्तराखंड में वर्ष 2012 से 2019 के बीच हुए मानव-वन्य पशु संघर्ष की घटनाओं में मारे गए 311 लोगों में से आधे से अधिक (163 लोग ) गुलदार के शिकार हुए हैं। उत्तराखंड में पिछले चार सालों, 2016-17 से लेकर 2019-20 तक 91 मनुष्य गुलदार ने मारे हैं। वर्ष 2020 में पहले नौ माह में वन्य जीवों के हमले में राज्य के 33 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और 160 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इन मरने वाले व्यक्तियों में सबसे ज्यादा 18 शिकार गुलदार ने किए। यह पता वर्ष 2020 की एक रिपोर्ट से चलता है, जो पिछले दिनों राज्य ने केंद्र को भेजी है। वन्य जीवों के हमले की सबसे ज्यादा घटनाएं पिथौरागढ, अल्मोड़ा, नरेंद्रनगर, टोंस और पौड़़ी डिवीजन में हुईं। इन्हीं जगहों पर मरने और घायल होने वालों की संख्या भी सबसे ज्यादा रही।

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इधर अंग्रेजी के एक बड़े अखबार के दावे के अनुसार वर्ष 2020 के पहले 10 माह में उत्तराखंड में मानव-वन्य पशु संघर्ष में 50 लोगों की जान गई है। इनमें सबसे ज्यादा 24 लोग गुलदार (लेपर्ड) के हमले में मारे गए हैं। वहीं इस दौरान कुल 214 लोग घायल हुए। अखबार ने वन विभाग उत्तराखंड के डेटा का हवाला देते हुए लिखा है कि वर्ष 2016 से वर्ष 2019 के दौरान प्रदेश में मानव-वन्य पशु संघर्ष में कुल 226 व्यक्तियों की मृत्यु हुई और 1242 लोग घायल हुए। ये आंकड़े किसी के हृदय को भी गमगीन करने वाले हैं। घर के आंगन में चहल कदमी करते बच्चे और जंगल-खेतों में काम करती महिलाएं इस खूंखार पशु का शिकार ज्यादा हो रहे हैं। हाल ही में टिहरी जिले में गुलदार ने घर के बाहर हाथ-मुंह धोती एक सात साल की मासूम बच्ची को झपट्टा मारकर उठा लिया। टिहरी जिले में ही कसमोली गांव के एक पांच वर्षीय बालक को मार डाला। पौड़ी जिले में जंगल में पशु चराते एक 14 वर्षीय बालक को गुलदार ने मार डाला। पिथौरागढ़ जिले के चंडाक गांव की एक महिला खेत में घास काटते हुए अचानक हमलावर के तौर पर आए गुलदार का शिकार बन गई। अल्मोड़ा के डूंगरी उडल गांव में देर शाम घर के आंगन में खेलती ढ़ाई साल की बच्ची को गुलदार उठाकर ले गया।
अल्मोड़ा जिले में ही नगर पंचायत भिकियासैंण के गांधी नगर वार्ड स्थित बाड़ीकोट कस्बे में गुलदार घर से कुछ दूर खेल रहे चार बच्चों में से एक सात वर्षीय बालिका को उठा ले गया था।
पिथौरागढ़ जिले में 17 अक्टूबर 2020 की शाम को जिला मुख्यालय से सटे पौण गांव में नेपाल निवासी आठ वर्षीय देवराज पुत्र करन सिंह पर घात लगाकर बैठे गुलदार ने उस वक्त हमला कर दिया, जब वह लघुशंका के लिए बाहर आया। पिता के शोर मचाने पर गुलदार बालक को घायल कर भाग गया। पौण ग्राम प्रधान प्रतिनिधि महिपाल वल्दिया के नेतृत्व में ग्रामीणों ने देवराज के इलाज के लिए आपस में 75 हजार की धनराशि एकत्रित कर पिता करन सिंह को सौंप कर बरेली भेजा। देवराज के गले में गुलदार ने गहरा घाव किया था। बरेली में आपरेशन के लिए चिकित्सकों ने पांच से छह लाख की धनराशि की आवश्यकता बताई जो संभव नहीं हुआ। घायल बच्चे को वापस पिथौरागढ़ जिला अस्पताल लाया गया जहां कुछ दिन बाद देवराज ने अस्पताल में दम तोड़़ दिया। ये घटना बताती है कि जंगली पशु के हमले में घायल व्यक्ति का इलाज करवाना भी सभी पीड़ितों के लिए संभव नहीं। ऐसे मामलों में सरकार फौरी सहायता दे, तभी असहाय घायल व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। बस्तियों में आकर खूंखार जंगली पशु मनुष्यों को हानि पहुंचाने के अलावा पालतू पशुओं को भी काफी क्षति पहुंचाते हैं।
वन मंत्री हरक सिंह रावत ने 2019 के दौरान विधानसभा सत्र में सदन में एक सवाल के उत्तर में बताया कि जनवरी 2017 से सितम्बर 2018 के बीच मानव-वन्य जीव संघर्ष में 79 मनुष्य व 11 हजार से ज्यादा पालतू पशु मारे गए। स्थिति का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि आदमखोर हो चुके गुलदारों को मारने के लिए वन विभाग को बकायदा कान्ट्रैक्ट पर अनुभवी व सधे निशानेबाज अनुबंधित करने पड़़ रहे हैं। उत्तराखंड में सन् 2000 से 2019 तक आदमखोर घोषित किए गए 56 तेंदुए और 4 बाघों को अनुबंधित शिकारियों ने मारा है।
सर्वाधिक 13 नरभक्षी गुलदार 2009 में मारे गए। उसके बाद 2007 में 8 गुलदार व 2016 में 7 गुलदार मारे गए। पिछले साल आदमखोर घोषित किए गए 4 गुलदारों को शिकारियों ने अपनी गोली का निशाना बनाया। वन विभाग उत्तराखंड वर्ष 2020 में करीब 90 लेपार्ड (गुलदार) को पिंजरे में बंद करने, बेहोश करने या मारने को सहमति दिखा चुका है। इनमें से पांच तेंदुओं (गुलदार) को बेहोश करने या मारने को विभाग ने हामी भरी, बाकी को पिंजरे में बंद करने या बेहोश करने की अनुमति दी गई है। तेंदुए को पहाड़ी क्षेत्र में लोग गुलदार कहते हैं। शेर, तेंदुआ, बाघ व जगुआर चारों बड़़ी बिल्लियां विडाल प्रजाति की हैं। ये पैंथेरा जीनस के अन्तर्गत आते हैैं। तेंदुए की स्पेसीज पैंथेरा पारडस है। इसकी उपजाति भारतीय तेंदुए का वैज्ञानिक नाम पैंथेरा पारडस फुस्का है। तेंदुए को बघेरा भी कहा जाता है। तेंदुए को भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के सूची-1 के तहत संरक्षित किया गया है। इसके गैरकानूनी मारने पर कठोर सजा का प्रावधान है। मोटे तौर पर बाघ और तेंदुए की पहचान उनके फर पर बनी अलग रंग की संरचना से की जा सकती है। तेंदुए के फर पर धब्बे होते हैं, जबकि बाघ के फर पर पट्टियां दिखाई देती हैं। प्राणीशास्त्र व जानवरों के व्यवहार के अध्येताओं का कहना है कि तेंदुआ या लेपार्ड ज्यादा खतरनाक शिकारी होता है। यह गुप्त रहने वाला जानवर है जो शिकार का पीछा करने के बजाय घात लगाकर हमला करता है और रात में सोने के बजाय ज्यादातर समय शिकार की खोज में रहता है। बाघ भारी शरीर की वजह से पेड़ पर कुछ ऊंचाई तक जा सकता है पर तेंदुआ पेड़ में उसकी टहनी तक तेजी से चढ़ सकता है। वह पेड़ से भी घात लगाकर अपने शिकार पर हमला करता है। कई बार घास-फूस और मिट्टी के रंग से इसका रंग मिलान हो जाने से इसे देखना आसान नहीं होता। जानदार और शानदार इतना कि जिम कार्बेट भी कहते हैं कि तेंदुआ सभी जानवरों में सबसे सुन्दर व आकर्षक जानवर है और साहस में अव्वल जबकि बाघ के बारे में उनका कहना है कि वह असीमित साहसी व जेन्टलमैन जानवर है। अब तक 50 से अधिक नरभक्षी घोषित किए गए
बाघ-गुलदारों का शिकार कर चुके लखपत सिंह रावत जिन्हें चमोली का जिम कार्बेट कहा जाता है। उनका कहना है कि इतने सुन्दर और खाद्य श्रृंखला के अहम प्राणी को मारते हुए उन्हें बड़ी पीड़ा होती है। लखपत सिंह रावत इस अनचाही स्थिति के लिए मनुष्य को जिम्मेदार मानते हैं, जिसने इन प्राणियों के प्राकृतिक आवास और शिकार को नष्ट किया है।
क्यों आ रहे मानव बस्तियों की ओर तेंदुए
तेंदुए जैसे खूंखार वन्य पशुओं का मानव बस्तियों में बार-बार आना मानव को तो घातक होता ही है, पर यह स्थिति वन्य प्राणी के लिए भी खतरा है। एक तरफ पिछले सालों में हल्द्वानी, पिथौरागढ़, पौड़ी वन प्रभागों के गांवों में तेंदुआ मंडराने की दर बढ़ी है, परन्तु दूसरी ओर शहरी क्षेत्र से लगे गांवों तथा कभी-कभी शहर में भी ये जानवर घुसने लगे हैं। वर्ष 2018 की एक घटना में गुलदार हरिद्वार के खड़खड़ी स्थित गंगा भक्ति आश्रम में घुस गया था, जिसे संतों ने मौका पाकर कमरे में बंद कर दिया। वर्ष 2019 में हरिद्वार के रानीपुर कोतवाली क्षेत्र में आदमखोर गुलदार ने एक युवक को मार डाला था। भेल व उससे सटे इलाके में गुलदार की चहलकदमी से लोग दहशत में रहते हैं। ऋषिकेश में जंगलों से लगे इलाकों में भी गुलदार को लेकर दहशत रहती है। वर्ष 2020 में गर्मियों के दौरान दून व मसूरी वन प्रभाग में कोटरा संतोष व मसंदावाला गांवों के निवासियों ने डीएफओ को पत्र देकर गुलदार-बाघ से बचाव की मांग की थी। गुलदारों की मानव से घटती दूरी की वजहें कई बताई गई हैं जिनमें उनके प्राकृतिक आवासों व शिकार की उपलब्धता में मानवीय हस्तक्षेप काफी प्रभावी कारक माना जाता है। उत्तराखंड में तराई के संरक्षित वनों में बाघों की संख्या में वृद्धि होने से गुलदारों का वहां से पलायन बढ़ा है और वे उत्तर दिशा की पहाड़ियों में जा रहे हैं, जहां वे गांवों में मंडराने लगते हैं और मानव-वन्य प्राणी संघर्ष की घटनाएं सामने आती हैं। गुलदार के लिए बदली दशा में अनुकूलन करना आसान रहता है, क्यों कि वह मुर्गीखाने के अवशेष और अस्पतालों से खुले में फेंके जाने वाले अवशेष को भी अपना भोजन बना लेता है।
गांवों से परिवारों के पलायन के बाद वहां पसरा सन्नाटा भी वन्य पशुओं के लिए आसानी से बस्तियों में मंडराने को माहौल देता है। कभी-कभी ये पशु वहां बसेरा भी करने लगते हैं। गुलदार में बदलती परिस्थितियों में सीखने की बेहतर क्षमता होने से वह बाघ या शेर के मुकाबले जल्दी अपने व्यवहार में अनुकूलन कर लेता है। वन विभाग ने अपने एक अध्ययन के निष्कर्ष में पाया कि बाघ, हाथी, तेंदुआ जैसे वन्य पशु अपना पारम्परिक कॉरीडोर बदल रहे हैं, जिस वजह से भी उनका मनुष्यों के समीप आना-जाना हो रहा है। रामनगर में ढ़िकुली व गार्जिया के मध्य व चूनाखान से होते हुए एक ऐसा ही कॉरीडोर है, जो टाइगर रिजर्व से बाहर है।
पिछले दिनों की मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि नरेन्द्रनगर जैसे वन प्रभाग में गुलदार सड़कों पर टहलते देखे गए। वहां चारधाम सड़़क परियोजना क्षेत्र होने से कई दिनों तक मुख्य सड़क पर ट्रैफिक काफी कम रहा खाली सड़क पाकर गुलदार सड़क पर आने-जाने लगे; वहीं लोगों ने आने-जाने के लिए तंग रास्तों का प्रयोग किया, जहां गुलदार के हमले की संभावना बढ़ जाती है। चौंकाने वाली एक और वजह विशेषज्ञों ने पशुओं के व्यवहार और मूवमेंट में बदलाव की बताई है। केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में कोविड-19 के कारण किए गए लंबे लॉकडाउन में जंगली पशु बढ़ती हुई संख्या में मानव बस्तियों के पास देखे गए हैं। वैज्ञानिक इस व्यवहार का अध्ययन कर रहे हैं। 22 जून 2020 को प्रकाशित जरनल ‘नेचर, इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन‘ में बताया गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिकों का एक समूह कोविड-19 के लॉकडाउन से पहले, लॉकडाउन के दौरान और लॉकडाउन के बाद की स्थिति में पशुओं के मूवमेंट, व्यवहार और तनाव का डेटा के आधार पर अध्ययन कर रहा है। ये वैज्ञानिक सहमत हैं कि लॉकडाउन की वजह से स्तनपायी जानवरों, जलीय जंतुओं व पक्षियों के व्यवहार में गौर करने लायक बदलाव आया है।
उत्तराखंड वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि लेपार्ड के आक्रमण में बढ़ोतरी की एक वजह लॉकउाउन है। उनका कहना है कि पहाड़ में सड़क किनारे अक्सर दिखने वाले तेंदुए लॉकडाउन के चलते खाली सड़कें मिलने से सड़कों पर चहलकदमी करने को स्वच्छंद हो गए। वे मनुष्यों की बस्तियों में आसान शिकार की खोज में आ रहे हैं। वन विभाग गुलदार के इस बदले व्यवहार का अध्ययन कर रहा है। यूं देखा जाए तो गुलदार मानव बस्तियों में पहले से आते रहे हैं, पर आज उनकी संख्या व बारंबारता बढ़ गई है। जानकारों ने स्वच्छ भारत अभियान के प्रभाव को भी गुलदारों के बस्तियों में बढ़ते हमले के एक और कारण के तौर पर देखा है। उनका तर्क है कि शौचालय का प्रयोग करने से लोगों का शौच के लिए बाहर जाना कम हो गया है। बाहर शौचालय जाने का समय प्रायः मंद रोशनी वाला होता है, जिसमें घात लगाए गुलदार को आक्रमण करने का मौका मिल जाता है। लोगों द्वारा शौचालय के प्रयोग से बस्ती के बाहर अपने शिकार का इंतजार कर रहा गुलदार बस्ती में शिकार की तलाश में आने लगा है, इसलिए भी वह बस्तियों में आकर लोगों पर हमला करने लगा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान के परियोजना वैज्ञानिक बताते हैं कि बढ़ता शहरीकरण, कूड़ा, कुत्तों की बढ़ती संख्या और मांस की दुकानों में बढ़ोतरी आसानी से उन्हें आबादी क्षेत्र में ले आती है। भारतीय वन्य जीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक एस. सथ्याकुमार के अनुसार-सबसे अधिक अनुकूल आवास को सर्वाधिक ताकतवर, मध्यम दर्जे के आवास को कम ताकतवर तेंदुआ अपना रहा है। ये कमजोर और बूढ़े तेंदुए को छितराए जंगल या गांवों में धकेल देता है। सबसे कमजोर तेंदुआ पालतू जानवर या मनुष्य पर आक्रमण करता है। उनका कहना है कि गुलदार का ज्यादा नजर आना डर की वजह नहीं होनी चाहिए, बल्कि जरूरत उसके व्यवहार को समझने की है।
विज्ञानवेत्ता के अनुसार सभी जानते हैं कि गुलदार या तेंदुआ अपने व्यवहार को सीखने के साथ बदलते हैं, यदि उन्हें एक बार लगा कि यह आसान है तो वे मनुष्य का शिकार करने लगते हैं।

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बेर-केर का संग कैसे निभेगा?
वन्य पशु के व्यवहार के बारे में इस रिपोर्ट में उत्तराखंड का संदर्भ जरूर है, पर काफी सारी बातें अन्य राज्यों के संबंध में भी प्रासंगिक हैं। जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, बंगाल और उत्तराखंड पांच राज्यों में गुलदारों का काफी आतंक है। वर्ष 2019 में गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान संस्थान की राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन की परियोजना के भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने मानव-वन्य जीव संघर्ष को लेकर इन पांच राज्यों में किए गए शोध की एक रिपोर्ट पेश की थी। वैज्ञानिकों के अनुसार उपरोक्त पांच राज्यों में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में सर्वाधिक गुलदार हैं। इस क्षेत्र में उनका घनत्व काफी अधिक है। प्रति सौ वर्ग किलोमीटर में औसतन 13 गुलदार हलचल करते पाए गए, वहीं 15 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में औसतन एक गुलदार निवास करता है। पौड़़ी जिले में गुलदारों की संख्या अधिक क्यों है, इसका एक संभावित कारण उन्हें पर्याप्त भोजन मिलना बताया गया है। यह भी संभव है कि अन्य क्षेत्रों में आवास की परेशानी के कारण वे यहां आए हों। वैज्ञानिकों ने कहा कि भविष्य में यदि गुलदारों को भोजन की कमी हुई तो यह मनुष्य के लिए घातक भी हो सकता है। शोध में यह बात भी सामने आई है कि बीते वर्षों में जंगली जानवरों के हमलों में भी काफी इजाफा हुआ है। जलवायु परिवर्तन, मानव का वनों में बढ़ता हस्तक्षेप, वन्य जीवों के भोजन और आवास में हस्तक्षेप तथा उनके घनत्व में परिवर्तन आदि अन्य कारकों ने वन्य जीवों और मनुष्य के बीच संघर्ष तेज कर दिया है। इस कारण हर साल इन क्षेत्रों में गुलदार, बाघ, बंदर, भालू, हाथी, जंगली सूअर लोगों पर हमला कर रहे हैं। परिणामतः कई जगहों से मनुष्यों का पलायन बढ़ा है, किसानों ने खेती करना छोड़़ दिया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार गुलदारों से राज्य में सबसे अधिक खतरा भी पौड़ी जिले में है। यद्यपि यहां वे आक्रामक नहीं हैं। अब सवाल ये है कि या तो वन विभाग या सरकार जान-माल को नुकसानदायक जंगली जानवरों को जंगल के भीतर ही सीमित करें, जो अनेक कारणों से संभव नहीं लगता, पर वैज्ञानिक विधियों से जंगली पशुओं की गतिविधि पर नजर रखने और जंगल से सटे इलाकों में लगातार गश्त करने व सुरक्षा उपायों से जंगली जानवरों का बस्तियों की ओर जाने पर एक हद तक नियंत्रण करना संभव है। अगर सरकार फॉरेस्ट गार्ड की भर्ती को ही सालों तक पूरा नहीं कर पाती है तो यह कैसे कहा जा सकता है कि जंगल को संभालने की जिम्मेदारी उठाने वाला वन विभाग पूरी क्षमता से काम कर पाएगा।
यही नहीं वन विभाग में नए व आधुनिक उपकरणों की कमी सामने आती रहती है। विभाग के अधिकारी बार-बार पर्याप्त पशु चिकित्सक न होने का रोना रोते रहते हैं। हालत ऐसी हो गई है कि पहले मानव ने जंगलों में घुस कर जंगल के संतुलन को तबाह किया और अब जंगली पशु मानव बस्तियों की ओर गश्त कर रहे हैं और वहीं अपना भोजन या शिकार खोज रहे हैं। सरकारों की नीतियों और समाज के ताकतवर तबके की लूट से सम्पत्ति जोड़ने की चाह ने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि कोई चाह कर भी उसके दुष्परिणाम से बच नहीं सकता। इसका परिणाम यह है कि जंगल में मस्त रहने वाले पशु और जंगल व वन्य पशु से अनुभव से हासिल कौशल के बल पर सहज रिश्ता रखने वाले जंगल के समीप के निवासियों में आज युद्ध छिड़ने जैसा माहौल दिखाई देता है।
वन विभाग आदमखोर हो चुके गुलदारों के लिए पिंजड़े में कैद करने या गोली से मारने के समाधान के लिए मजबूर है। पिथौरागढ़ जिले के बुजुर्ग शिकारी इकबाल अहमद ने सरकार को सुझाव दिया कि गुलदार के हमले से सुरक्षा के लिए सरकार हर जिले में दो स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर बतौर शिकारी तैनात करे।
लोग कैसे हिंसक वन्य पशुओं से बचें
इसके लिए विभाग खूब इश्तहार देकर एसओपी जारी करने पर लगा है। प्रमुख वन संरक्षक, वन्य जीव, मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक डा. राजीव भरतरी के मुताबिक ‘ज्यादातर मामलों में बचाव के तरीके यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मनुष्य की जान न जाए या वह घायल न हों, किन्तु इसके लिए जागरूकता, चौकन्नापन और मानव-पशु भिडं़त बचाने के संदर्भ में मानव व्यवहार को नियंत्रित करने की जरूरत है। लेकिन कुछ मामलों में लेपार्ड के साथ समस्या आती है, उन्हें चिन्हित करना पड़ता है और शीघ्रता से समाप्त करना पड़ता है।’
गौरतलब है कि वन विभाग जंगली जानवरों की वजह से नुकसान होने पर पीड़ित लोगों को मुआवजा या राहत राशि देता है। इसके लिए मानव वन्यजीव संघर्ष राहत वितरण निधि नियमावली बनाई गई है। इस दशक में इसे पहले वर्ष 2012 में संशोधित किया गया और फिर 2018 में इसमें मुआवजा राशि में बढ़ोतरी की गई। नियमावली के तहत वन्य पशुओं द्वारा इंसान को हानि पहुंचाने, पालतू जानवर को मारने के अलावा घर अथवा फसल की क्षति की स्थिति में पीड़ित पक्ष मुआवजे के लिए दावा कर सकता है। हर डीएफओ के खाते में मुआवजे के लिए सालाना एक तयशुदा रकम रखी जाती है। डीएफओ को एक बार में इतनी ही रकम बतौर मुआवजा देने का हक है।
अगर किसी मुआवजे की मांग के पीछे झूठी कहानी हुई तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज हो सकता है। नियमावली के प्रावधान के अनुसार सांप के काटने, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, जंगली हाथी, भालू, लकड़बघा, जंगली सूअर, मगरमच्छ-घड़ियाल के हमले में मौत या घायल होने पर मुआवजा दिया जाएगा। इसमें पालतू पशुओं की मौत होने पर मुआवजे का प्रावधान है। यदि जंगली हाथी, जंगली सुअर, नील गाय, काकड़, सांबर, चीतल और बंदरों से फसल को नुकसान होता है या जंगली हाथियों से मकान को क्षति पहुंचती है तो संबंधित व्यक्ति वन विभाग से मुआवजा प्राप्त करने को दावा कर सकता है।

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