कलमकारों के हाथ ‘कलम’ करने की शुरुआत

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कलमकारों के हाथ ‘कलम’ करने की शुरुआत

देहरादून। पर्वतजन पोर्टल के संपादक शिव प्रसाद सेमवाल की गिरफ्तारी से प्रदेशवासियों का असमंजस में पडऩा स्वाभाविक है। यह इसलिए कि जिस व्यक्ति की धारधार लेखनी नेे तमाम सरकारों व नौकरशाहों के बड़े-बड़े घपले-घोटालों को सार्वजनिक किया हो, आखिर उस व्यक्ति को पुलिस द्वारा इस तरह अचानक घर से उठाकर थाने ले जाना और देर शाम गिरफ्तारी दिखाए जाने की नौबत क्यों आ गई? या फिर इतनी अनावश्यक धाराएं लगाया जाना क्या इसे जनहित में खबर छापने का ईनाम समझा जाए! आइए इस मामले को विस्तार से पाठकों के साथ साझा करते हैं।
दरअसल पर्वतजन ने ‘पूर्व राज्यमंत्री पर अपने ही सहयोगी सहित कई से नौकरी, ठेके दिलाने के नाम पर लाखों ठगने के आरोप’ नामक शीर्षक से 10 अक्टूबर 2019 को एक खबर प्रकाशित की थी। यह खबर अमित कुमार नामक व्यक्ति द्वारा 9 अक्टूबर को देहरादून में प्रेसवार्ता के आधार पर की गई थी।
जानकारी के अनुसार जब शिव प्रसाद सेमवाल उक्त खबर बना रहे थे तो उन्होंने नीरज राजपूत नामक व्यक्ति को उनका बयान लेने के लिए फोन किया था। नीरज ने इस खबर का खंडन छापने को कहा, जिसे श्री सेमवाल ने इंकार कर दिया। बस इसी बात को आधार बनाकर श्री सेमवाल पर मुकदमा कर दिया गया कि उक्त खबर को अमित कुमार से पैसे लेकर प्रकाशित करवाया गया, जबकि शिव प्रसाद सेमवाल का कहना है कि पर्वतजन ने प्रेसवार्ता के आधार पर खबर प्रकाशित की थी और लेन-देन का दूर-दूर से कहीं तक कोई वास्ता नहीं है।
चलिए मान लेते हैं कि नीरज राजपूत का कथन ठीक है कि उक्त खबर में उन्हीं की फोटो प्रकाशित की जानी चाहिए थी, न कि उनकी भाभी की, क्योंकि उनकी भाभी ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ रही थी। अगर चुनाव में उनकी छवि धूमिल हुई है तो उक्त मामले में मानहानि का मामला बनता था। ऐसे में 386 जैसी धारा लगाकर रंगदारी का मामला दिखाया जाना प्रदेशभर के पत्रकारों सहित तमाम अधिवक्ताओं तक को भी हजम नहीं हो रहा है।

बताते चलें कि पर्वतजन पत्रिका की शुरुआत उत्तराखंड गठन के साथ ही हुई। तब से लेकर आज तक जितनी भी सरकारों, नौकरशाहों व तमाम विभागों के घपले-घोटाले उजागर हुए हैं, उनमें पर्वतजन की खबरों का मुख्य योगदान रहा है। यही कारण है कि पर्वतजन हमेशा से सरकार की रडार पर रही।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस खबर की आड़ में पर्वतजन और उसके संपादक शिव प्रसाद सेमवाल पर नकेल कसने का प्रयास किया जा रहा है। शिव प्रसाद सेमवाल वर्तमान में उत्तराखंड वेब मीडिया एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। पिछले दिनों सूचना भवन में पत्रकारों के हितों की लड़ाई में सेमवाल के नेतृत्व में ही आंदोलन किया गया था। इस आंदोलन के बाद पत्रकारों की एकजुटता का सूचना विभाग से लेकर सरकार को भी भली-भांति एहसास हो चुका था। यही कारण है कि शिव प्रसाद सेमवाल जैसे दिग्गज पत्रकार को रोकने के लिए पिछले काफी समय से प्रयास किया जा रहा था। अब चूंकि मामला सहसुपर जैसा अन्यत्र क्षेत्र का था तो इसमें शक्ति लगाकर इसे कैरम की गोटियों की तरह मारक बना दिया गया।
फिलहाल चौथे स्तम्भ के साथ इस प्रकार का कृत्य किसके इशारे पर हो रहा है, इस पर प्रदेशभर से सवाल उठने शुरू हो गए हैं। आने वाले समय में इसकी ज्वाला सड़कों तक भी पहुंचे तो इसमें कोई संदेह नहीं। उल्लेखनीय है कि जनहित की आवाज उठाने वाले इससे पहले भी कई पत्रकारों पर इस तरह की कार्यवाही हो चुकी है।
बहरहाल, मामला अत्यंत संवेदनशील है, आने वाले समय में इसकी परतें स्वत: ही खुल जाएंगी, लेकिन इस प्रकरण से इतना अवश्य हुआ कि उत्तराखंड में कलमकारों के हाथ कलम करने की शुरुआत हो चुकी है, जो कभी किसी भी प्रदेश के हित में नहीं कहा जा सकता।

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