द्वारीखाल ब्लॉक : “सिलोगी पाठशाला” शताब्दी वर्ष में प्रवेश
प्रशांत मैठाणी
02 अप्रैल 1926 को श्रद्धेय स्वर्गीय श्री सदानंद कुकरेती जी द्वारा स्थापित सिलोगी पाठशाला अपने निर्माण के 100 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह वर्ष विद्यालय का शताब्दी वर्ष है।
अनादि काल से ही गंगा सलाण, ढांगू क्षेत्र या कहें गढ़वाल की भूमि ज्ञानियों, विद्वजनों, वीरों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। इस क्षेत्र में हर विधा के सिद्धहस्त जन्म ले चुके हैं। लघु हिमालय में बसी सिलोगी पाठशाला (वर्तमान राजकीय इंटर कालेज सिलोगी) पौड़ी जिले के द्वारीखाल विकासखंड में है। इस विद्यालय के निर्माण से लेकर वर्तमान तक की उत्तरोत्तर वृद्धि बड़ी रोचक और संघर्षमय रही है। लघु हिमालय में बसा राजकीय इंटर कालेज सिलोगी से हिमालय की अनेक हिमाच्छादित चोटियों के सुरम्य दर्शन होते हैं। हमारे देश के ऋषि, मुनि एवं गुरुओं ने श्री विष्णु पुराण में उल्लेखित श्लोक “सा विद्या या विमुक्तये” का ज्ञान देकर शिक्षा के महत्ता पर बल दिया। यह विद्यालय इसका अनुपम उदाहरण है।
सिलोगी के संत नाम से प्रसिद्ध श्रद्धेय स्व० सदानंद कुकरेती जी इस विद्यालय के संस्थापक रहे हैं। श्रद्धेय स्व० श्री सदानंद कुकरेती जी पूरा जीवन महात्मा का रहा है। उनके इसी सादगी पूर्ण जीवन के कारण उन्हें भक्त दर्शन जी ने संत के नाम से सुशोभित किया था। संत जी का जन्म तत्कालीन ब्रिटिश गढ़वाल जो तब संयुक्त प्रांत के कुमाऊं कमिश्नरी का एक जिला हुआ करता था, चूंकि औपनिवेशिक काल में कुमाऊं कमिश्नर द्वारा उसके अंतर्गत आने वाले पौड़ी, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों को विभिन्न पट्टियों में विभक्त किया गया था, इसी में गढ़वाल जिले की एक पट्टी आती थी या आती है ढांगू पट्टी। गढ़वाल जिले के इसी ढांगू पट्टी में 07 मार्च 1886 को ग्राम ग्वील में श्री सदानंद कुकरेती जी का जन्म हुआ था, इनके पिता श्री बालादत्त कुकरेती थे और जानकारी के अनुसार स्वर्गीय बालादत्त्त जी तब लोक निर्माण विभाग में सेवा देते थे।
सदानंद जी की प्रारंभिक शिक्षा हमारे क्षेत्र के काफी पुराना प्राथमिक विद्यालय बड़ेथ में हुई और उसके उपरांत हाईस्कूल पढ़ाई हेतु वे चोपड़ा (पौड़ी) गए। सदानंद कुकरेती जी अपने ही पिता के विभाग में अध्ययन के उपरांत कार्यरत हुए, उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास या औपनिवेशिक काल के आंदोलन में उनकी भागीदारी की चर्चा करें तो उनका नाम पौड़ी जिले से प्रकाशित होने वाले तब अत्यंत लोकप्रिय मासिक समाचार पत्र “विशाल कीर्ति” के संस्थापक में रहा हैं।
गढ़वाली भाषा की प्रथम कथा या कहानी “गढ़वाली ठाठ” शीर्षक से 1913 में सदानंद कुकरेती ने विशाल कीर्ति मासिक पत्रिका में इसको प्रकाशित किया था। बीते वर्ष राज्य की एक प्रतियोगी परीक्षा में “गढ़वाली ठाठ” के लेखक का नाम भी पूछा गया था। सदानंद जी ने सन 1913 में इस समाचार पत्र को शुरू किया था। सन 1913 में श्री ब्रह्मानंद थपलियाल जी द्वारा पौड़ी में बद्री केदार प्रेस की स्थापना की गई थी और इसी प्रेस के माध्यम से सदानंद कुकरेती जी द्वारा विशाल कीर्ति नामक मासिक पत्र प्रकाशन किया गया। गढ़वाल क्षेत्र के सभी भली बुरी जरूरी खबरों को वह बड़ी ही अलग शैली में प्रकाशित करते थे जिसके कारण उन्हें अत्यंत ही लोकप्रिय पत्रकार माना जाता था।
हालांकि सरकार के विरुद्ध लिखने के कारण वह ब्रिटिश अधिकारियों के आंखों में खटकने लगे थे उनके द्वारा सरकार के अनेक काले कारनामों का पर्दा पास किया गया, जिसके लिए उन्हें कई बार सरकार ने प्रलोभन भी दिए किंतु वे अपने मार्ग पर तटस्थ रहे। विशाल कीर्ति की लोकप्रियता इतनी थी कि तब लोग इस समाचार पत्र के प्रकाशन का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करते थे और लोगों को यह प्रतीक्षा रहती थी कि किस अधिकारी की सामत इस महीने के अंक में सदानंद कुकरेती के कलम से होगी।
इसी कारण तब कहीं लाट साहबों का तबादला हुआ और सरकारी महकमों में इस मासिक पत्र के कारण खलबली मची रहती थी। गढ़वाल क्षेत्र के प्रथम सांसद स्व० श्री भक्त दर्शन जी ने अपनी अमूल्य पुस्तक गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां में सदानंद कुकरेती जी को “सिलोगी के संत” नाम से सुशोभित किया है। भक्त दर्शन जी ने अपनी पुस्तक में सदानंद जी का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है वह लिखते हैं कि विशाल कीर्ति पत्र से सदानंद कुकरेती के अलग होने के बाद वे जोध सिंह नेगी के साथ टिहरी रियासत में रीडर पद के लिए 4 सालों तक कार्यरत रहे और उनका तटस्थ रूप देखकर तब टिहरी रियासत में भी उनसे सब थरा्या करते थे।
सदानंद कुकरेती जी ने स्कूली शिक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। भक्त दर्शन जी लिखते हैं पहले सदानंद जी ने चेलूसैंण में हिंदू पाठशाला की स्थापना की और वहीं पर अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे, किंतु कुछ समय उपरांत मतभेद के कारण वे अलग हो गए। उसके उपरांत सदानंद जी ने अपने कुछ छात्रों के साथ सिलोगी में “सिलोगी पाठशाला” की स्थापना की और अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने यह एक आदर्श शिक्षण संस्था के रूप में विकसित किया। 1937 में सिलोगी के संत श्री सदानंद कुकरेती जी का निधन हो गया। भक्त दर्शन जी अपनी पुस्तक गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां में लिखते हैं कि सदानंद कुकरेती जी का अंतिम समय में वे “हर समय विद्यालय की चिंता और रोज उनकी ग्वील-बड़ेथ की चढ़ाई!” इसी चिंता का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा और 18 जुलाई 1936 को उनका निधन हो गया। शिक्षा के लिए अपना अनुपम योगदान देने वाले सदानंद कुकरेती जी को शत-शत नमन वे सचमुच में हमारे गढ़वाल की विभूति है और उनका किया गया अनुपम प्रयास का स्मारक आज भी सिलोगी विद्यालय के रूप है. श्रद्धेय सदानंद कुकरेती जी का पुण्य स्मरण चिर काल तक होता रहेगा।
उसके उपरांत धनाभाव के कारण यह विद्यालय बंद होने की कगार पर आ गया था, उसके उपरांत श्रद्धेय स्वर्गीय श्री नंदा दत्त कुकरेती जी ने इस विद्यालय का प्रबंधन देखा और विद्यालय को आगे बढ़ाया। स्वर्गीय श्री नंदादत्त कुकरेती जी ने भी इस विद्यालय के लिए असाधारण प्रयास किए। 1932 में स्व0 श्री हरिराम जखमोला जी इस विद्यालय में प्रथम प्रधानाध्यापक बनें। उनके और श्रद्धेय नन्दा जी के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विद्यालय अपने 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है।
मुझे अपने बड़े बुजुर्गों से जानकारी मिली कि हमारे स्वर्गीय परदादाजी वैद्यराज श्री जगतराम मैठाणी भी इस विद्यालय के प्रबंधक सदस्यों में रहे हैं, श्री जगतराम मैठाणी जी महादेव चट्टी और गैंडखाल के विद्यालयों के प्रबंधक या मैनेजर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं, 50 के दशक में स्वर्गीय दादा जी श्री जगतराम मैठाणी जी का सिलोगी में आयुर्वेदिक औषधालय था, उसी दौरान वे इस विद्यालय के प्रबंधक के सदस्यों के साथ विद्यालय के प्रगति के लिए अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
वरन सिलोगी के विद्यालय को 1952 में हाई स्कूल की मान्यता मिली और 1979 में यह इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में उच्चीकृत हुआ, 1971-72 में यहां पर विज्ञान वर्ग के लिए अलग संकाय बनाया गया। वर्ष 1991 में सिलोगी विद्यालय का प्रांतीयकरण होकर यह राजकीय इंटर कॉलेज सिलोगी बन गया। पिछली सदी के उत्तरार्ध में यह एक आवासीय विद्यालय हुआ करता था। संभ्रांत हो या गरीब सभी अपने बच्चों को पढ़ने हेतु इस विद्यालय में भेज दिया करते थे जहां शिक्षक गुरु और संरक्षक दोनों की भूमिका में बच्चों को देखा करते थे।
इस विद्यालय के मेधावी और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र/ छात्राओं के लिए 1986 से मित्र ग्राम के श्री चंद्रमणि जखमोला जी अपने स्वर्गीय पिता की स्मृति में श्री विष्णु दत्त जखमोला स्मृति पुरस्कार देते आ रहे हैं। श्री चंद्रमणि जखमोला जी द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालय के मेधावी और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र छात्राओं के लिए यह सम्मान प्रेरणादायक है! हमारा सौभाग्य है कि ऐसा व्यक्तित्व जो ग्रामीण अंचल में शिक्षा को प्रोत्साहित कर रहे हैं वो हमारे परिवार के दामाद हैं, हमारे स्वर्गीय परदादा श्री जगत राम मैठाणी जी की सुपुत्री श्री चंद्रमणि जखमोला जी की धर्मपत्नी थी। उनका यह अनुकरणीय कार्य हमारे परिवार लिए भी प्रेरणादायक है।
इस विद्यालय के आरम्भिक शिक्षकों में स्व0 पुरुषोत्तम दत्त शास्त्री जी (कठुड़ बड़ा), स्व० श्री गोकुल राम चौहान जी, स्व० श्री आदित्य शर्मा जी, स्व० श्री रामदयाल बिंजोला जी, स्व० श्री पीतांबर देवरानी, स्व० श्री गोविंद सिंह बिष्ट, स्व० श्री बलबीर रावत, स्व० श्री जानकी प्रसाद कुकरेती जी, स्व0 श्री गोकुल देव कुकरेती जी, श्री हरि प्रसाद ध्यानी जी, श्री रमाकांत बडोला, श्री मोहन लाल बिंजोला जी, श्री मोहन सिंह बिष्ट जी आदि हैं।
आज विद्यालय अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। राज्य सरकार, शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन, क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सहित सभी इस विद्यालय के शताब्दी वर्ष को एक दिव्य और भव्य पर्व के रूप में मनायेंगे।