टिहरी प्रतापनगर की घटना : प्रेम का जवाब घृणा, हिंसा और हत्या ?

Mukhyadhara
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प्रेम का जवाब घृणा, हिंसा और हत्या ?

इंद्रेश मैखुरी की कलम से…

टिहरी जिले के प्रतापनगर क्षेत्र के लंबगांव थाना क्षेत्र के देवल गांव के 18 वर्षीय युवक केतन पुत्र धनपत लाल को पीट- पीट कर मार डालने की घटना सामने आई है।

खबरों में सामने आए ब्यौरे के अनुसार केतन की पड़ोसी गांव खोलगढ़ की युवती से मित्रता थी. केतन अनुसूचित जाति का था और लड़की सामान्य वर्ग की।

अब तक जो ब्यौरा सामने आया है, उससे तो यही लगता है कि लड़की के परिजनों ने जानबूझ कर, षड्यंत्र के तहत, हत्या करने के लिए ही रात में लड़के को अपने गांव बुलाया और फिर उसे इस कदर पीटा कि अंततः 18 वर्षीय युवक की असमय मौत हो गयी और उसके साथ गया उसका दोस्त दिवाकर डिमरी गंभीर रूप से घायल है।

जाति का जहर लोगों को किस कदर हिंसक और वहशी बनाता है कि वे हत्या करने से भी नहीं चूकते, यह घटना, इसकी एक और मिसाल है. 2022 में ऐसे ही अल्मोड़ा जिले में दलित राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश चंद्र की भी तथाकथित उच्च वर्णीय युवती से विवाह करने पर पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी थी।

कूट कूट कर नसों में बहता जाति का जहर ही तो था, जिसके उन्माद में यशवीर पंवार और अन्य लोगों ने एक 18 वर्षीय युवा की जान ले ली. इससे उनको न कोई यश मिलने वाला है, न वे वीर सिद्ध होते हैं, वे सिर्फ उन्मादी हत्यारे ही बने, जाति के जहर के उन्माद में !

जाति का जहर दिमाग में खदबदा न रहा होता तो ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी. किशोरवय की मित्रता या प्रेम को सीधे ही जाति और उच्च वर्णीयता के नकली श्रेष्ठता बोध पर हमला क्यों समझना था ? जाति के इस नकली दंभ और श्रेष्ठता बोध पर थोड़ा भी खरोंच तक आने की आशंका लोगों को वहशी और हत्यारे में तब्दील कर देती है ! अमूमन तो युवक – युवती के प्रेम से ही लोगों को दिक्कत होती रहती है, लेकिन अंतर जातीय प्रेम, जिसमें एक पक्ष तथाकथित उच्च वर्णीय हो और दूसरा पक्ष दलित तो ऐसे मामले में तथाकथित उच्च वर्णीय लोग इस कदर बौरा और पगला जाते हैं कि प्रेम का गला घोंटने में हत्या करने में भी उन्हें कोई हिचक महसूस नहीं होती !

उत्तराखंड में आम तौर पर जातीय श्रेष्ठता के नकली बोध वाले भी यह कहते देखे जा सकते हैं कि हमारे यहां तो जात- पात नहीं है और हम तो जातीय भेदभाव को नहीं मानते !

सामान्य समयों में ऊपरी तौर पर यह बात ठीक लग भी सकती है, ऐसा भ्रम हो भी सकता है. लेकिन जाति के आधार पर फैसला लेने का निर्णायक मौका आता है तो यही जातीय भेदभाव न मानने का दावा करने वाले, अपने सबसे क्रूर रूप में उपस्थित हो जाते हैं।

इस दौर में जब धर्म की राजनीति अपने उफान पर है तो जातीय भेदभाव और उससे जनित अपराध भी बढ़ेंगे क्यूंकि जिस धर्म को बचाने की पुकार जोरशोर से लगाई जा रही है, जाति उसका मूल तत्व है, उसका अभिन्न, अविभाज्य अंग है. इसलिए धर्म बचाने के नारे में जाति और जातीय भेदभाव बचाने स्वतः ही समाहित है।

दुनिया में तमाम रोकटोक, हिंसा, के बावजूद प्रेम तो पनपता ही है और तमाम खतरों को जानते हुई भी प्रेम करना लोग नहीं छोड़ते. तमाम हिंसा- हत्याओं के बावजूद जाति- धर्म के बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ने की शै का नाम है प्रेम. लेकिन प्रेम की राह कुछ निरापद हो सके, इसके लिए समाज की नसों में बह रहे जाति के नकली श्रेष्ठता बोध के जहर का खात्मा वक्त की जरूरत है, मनुष्यता के लिए भी जरूरी है, जितना जल्दी हो सके, उतना बेहतर !

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