- केतन हत्याकांड ने खोले उत्तराखंड में जातीय भेदभाव के जख्म
- प्रतापनगर की घटना के बाद फिर उठे सवाल, क्या पहाड़ अब भी जातीय श्रेष्ठता के बोझ तले दबा है?
नीरज उत्तराखंडी
टिहरी जनपद के प्रतापनगर क्षेत्र में अनुसूचित जाति के युवक केतन लाल की बर्बर हत्या ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। घटना ने एक बार फिर उस सवाल को केंद्र में ला दिया है कि क्या उत्तराखंड जैसा शांत और सामाजिक सौहार्द वाला माना जाने वाला राज्य आज भी जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता की गहरी जड़ों से मुक्त नहीं हो पाया है!
मृतक केतन लाल की हत्या जिस क्रूरता के साथ की गई, इसने समाज को स्तब्ध कर दिया है। परिजनों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि युवक को न केवल बेरहमी से पीटा गया, बल्कि उसके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया गया। मामले की जांच जारी है। घटना के बाद पूरे प्रदेश में आक्रोश और आरोपी को फांसी की सजा देकर मृतक के परिजनों को न्याय दिलाने की मांग तेज हो गई है।
प्रेम संबंध बना मौत की वजह!
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार एक नाबालिग सवर्ण लड़की और अनुसूचित जाति के युवक केतन लाल के बीच सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क था। बताया जा रहा है कि दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे। जब इस संबंध की जानकारी लड़की के परिजनों को मिली तो कथित रूप से युवक को लड़की के फोन से ही गांव बुलाया गया।
बताया जाता है कि केतन अपने एक साथी के साथ मोटरसाइकिल से गांव पहुंचा, जहां पहले से मौजूद लोगों ने दोनों युवकों पर हमला कर दिया। हमले में केतन गंभीर रूप से घायल हो गया जबकि उसका साथी भी बुरी तरह जख्मी हुआ। अस्पताल ले जाते समय केतन ने दम तोड़ दिया।
शांत पहाड़ में बढ़ती जातीय हिंसा की चिंता
यह घटना इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाली है क्योंकि उत्तराखंड को हमेशा सामाजिक सौहार्द और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाले प्रदेश के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं ने इस धारणा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक हत्या का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो आज भी जाति के आधार पर मनुष्यों की श्रेष्ठता और हीनता तय करती है।
जगदीश हत्याकांड की याद फिर हुई ताजा
प्रतापनगर की घटना ने अल्मोड़ा जिले के सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश हत्याकांड की याद भी ताजा कर दी है। जगदीश ने वर्ष 2022 में एक सवर्ण युवती से विवाह किया था। तब उस विवाह से नाराज युवती के सौतेले परिजनों ने सितंबर 2023 में उनका अपहरण कर हत्या कर दी थी।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि दोनों घटनाओं में समानता यह है कि जातिगत पूर्वाग्रह और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर हिंसा को अंजाम दिया गया।
अनुसूचित जाति वर्ग के उत्पीड़न की घटनाएं लगातार आती रहीं सामने
राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में अनुसूचित जाति के उत्पीड़न के सैकड़ों मामले दर्ज हो चुके हैं। सामाजिक संगठनों का दावा है कि बड़ी संख्या में मामले पुलिस और प्रशासन तक पहुंच ही नहीं पाते।
पिछले वर्षों की कुछ चर्चित घटनाएं इस प्रकार हैं:-
- ● वर्ष 2016 में बागेश्वर जिले में सोहन राम की हत्या का मामला।
- ● वर्ष 2019 में टिहरी के श्रीकोट गांव में दलित युवक जितेंद्र दास की हत्या।
- ● नवंबर 2021 में चंपावत के देवीधुरा क्षेत्र में रमेश राम की हत्या।
- ● सूखीढांग के सरकारी विद्यालय में दलित महिला के हाथ का बना मिड-डे मील खाने से बच्चों का इंकार।
- ● नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में क्वारंटाइन सेंटर में दलित के हाथ का बना भोजन खाने से इंकार।
- ● वर्ष 2023 में चंपावत जिले में बबीता विश्वकर्मा हत्याकांड।
- इन घटनाओं ने समय-समय पर राज्य में जातीय भेदभाव और सामाजिक असमानता की बहस को जन्म दिया।
- कफल्टा नरसंहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- उत्तराखंड के इतिहास में वर्ष 1980 का कफल्टा कांड भी एक काला अध्याय माना जाता है, जिसमें दलित बारातियों की सामूहिक हत्या हुई थी। समाजशास्त्रियों का मानना है कि ऐसी घटनाएं बताती हैं कि पहाड़ का समाज जातीय विभाजन से पूरी तरह मुक्त कभी नहीं रहा।
न्याय के साथ सामाजिक आत्ममंथन भी जरूरी
केतन लाल हत्याकांड की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग तेज हो रही है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और नागरिक समूहों ने पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग उठाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि जातीय श्रेष्ठता का दंभ और सामाजिक भेदभाव आज भी कई क्षेत्रों में मौजूद है। शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रसार के बिना ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा।
बड़ा सवाल
केतन लाल की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह उत्तराखंड समाज के सामने खड़ा वह आईना है जिसमें जातीय भेदभाव, सामाजिक असहिष्णुता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की तस्वीर दिखाई देती है। प्रश्न यह है कि क्या समाज इस घटना से सबक लेकर समानता और न्याय की दिशा में आगे बढ़ेगा, या फिर ऐसी घटनाएं समय-समय पर हमारी सामूहिक चेतना को झकझोरती रहेंगी।


