योजनाओं में मिलने वाला अनुदान सीधे कृषकों के खाते में? जरूर पढें कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ डा. राजेंद्र कुकसाल की ये खास रिपोर्ट

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डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर सीधे लाभार्थी को लाभ पहुंचाता है और उनके हित मारे जाने की गुंजाइश स्वत: ही खत्म हो जाती है। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्टों में शुमार रहे डीबीटी को उत्तराखंड के कृषि एवं उद्यान विभागों में भी लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। अब काश्तकारों के खातों में योजनाओं का लाभांश सीधे डीबीटी के माध्यम से जाएगा। ऐसे में कृषकों को राहत मिलेगी।
आइए प्रदेश में डीबीटी को किस तरह देखा जाता है, उत्तराखंड के वरिष्ठ उद्यान एवं कृषि विशेषज्ञ
डा० राजेंद्र कुकसाल की यह विश्लेषणात्मक रिपोर्ट आप भी जरूर पढें:-
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सचिव कृषि एवं कृषक कल्याण उत्तराखंड शासन के अनु भाग -2 देहरादून के पत्रांक 535 / Xlll-2/ 2021-5(28)/2014 दिनांक 17 मई 2021के अनुसार कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग ( कृषि एवं उद्यान विभाग) द्वारा   संचालित समस्त योजनाओं के अंतर्गत समस्त निवेश inputs जो कृषकों को अनुदान पर देय हैं, का अनुदान इसी वित्तीय वर्ष 2021 – 2022 से ही प्रदेश के पंजीकृत/चयनित कृषकों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डी०बी०टी०) के माध्यम से कृषकों को बैंक खाते में सीधे आर०टी०जी०एस० के द्वारा  स्थानान्तरित किये जानें के निर्देश कृषि एवं उद्यान निदेशक को हुए हैं।
कृषि एवं उद्यान विभाग की योजनाओं में पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से देर से ही सही किन्तु राज्य सरकार का एक अच्छा फैसला है ।इससे कृषकों को कितना लाभ मिलता है यह आने वाला समय ही बताएगा।
क्या है डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डी० बी० टी०) –
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) डी० बी० टी०,  केंद्र सरकार द्वारा  शुरू की गई इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा योजनाओं में प्रदान की जाने वाले सब्सिडी (अनुदान) का लाभ, चेक जारी करने, नकद भुगतान या सेवाओं अथवा वस्तुओं पर कीमत छूट प्रदान करने की बजाय सीधे लाभार्थी के खाते में स्थानांतरित यानी जमा  किया जाता है। इसके जरिए लाभार्थियों और जरूरतमंदों के बैंक खातों में सीधे रुपए डाले जाते हैं।
कुल मिलाकर भारत सरकार का एक ऐसा पेमेंट सिस्टम जिसके तहत लोगों के बैंक खातों में सीधे सब्सिडी डाली जाती है।
डी० बी० टी० के माध्यम से योजना का सीधा लाभ योजना से जुड़े लाभार्थी को होता है। DBT योजना का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें किसी तरह के धोखाधड़ी की गुंजाईश नहीं रहती है, क्योंकि यहां लाभार्थी के खाते में सरकार सीधे तौर पर पैसे ट्रांसफर करती है। इस प्रकार सरकारी योजना का पूरा फायदा लाभा​र्थी को मिल जाता है। डी० बी० टी० से जहां एक तरफ नकद राशि सीधे लाभार्थी के खाते में जाती है, वहीं गड़बड़ियों पर अंकुश लगता है और दक्षता बढ़ती है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi का संकल्प है कि किसानों को योजनाओं में मिलने वाला अनुदान सीधे कृषकों के खाते में जमा हो, इसी निमित्त भारत सरकार के कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय ने अपने पत्रांक कृषि भवन,नई दिल्ली दिनांक फरबरी, 28, 2017 के द्वारा कृषि विभाग की योजनाओं में कृषकों को मिलने वाला अनुदान डीवीटी के अन्तर्गत सीधे कृषकों के खाते में डालने के निर्देश सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि उत्पादन आयुक्त, मुख्य सचिव, सचिव एवं निदेशक कृषि को किये गये।
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उत्तर प्रदेश हिमाचल आदि सभी राज्यों में बर्ष के  2017 से ही कृषकों को योजनाओं में मिलने वाला अनुदान  डी बी टी के माध्यम से सीधे कृषकों के खाते में जा रहा है। इन राज्यों में पंजीकृत/चयनित कृषक  भारत सरकार/राज्य सरकार के संस्थानो /पंजीकृत बीज विक्रेताओं जो कृषि विभाग से पंजीकृत हों, से स्वेच्छानुसार एम आर पी से अनधिक दरों पर नगद मूल्य पर क्रय कर क्रय रसीद सम्बंधित विभाग से भुगतान प्राप्त करने हेतु उपलब्ध कराई जाती है। सत्यापन के बाद धनराशि कृषकों के बैंक खातों में विभाग द्वारा डाल दी जाती है।
उत्तराखंड में  बीज, दवा खाद आदि निवेश आपूर्ति करने वाले एजेंटों ने निदेशालय एवं शासन में बैठे नौकरशाहों से मिल कर इस योजना को राज्य में अभी तक लागू नहीं होने दिया।
मुख्यधारा ने अपने पोर्टल एवं साप्ताहिक पत्र में इस मुद्दे को  प्रमुखता से प्रकाशित किया था। साथ ही कई जागरूक नागरिकों द्वारा भी समय समय पर इस बिषय की मीडिया जगत में चर्चाएं होती रही। जिसका संज्ञान लेते हुए सरकार को शासनादेश करना पड़ा।
उत्तराखंड राज्य में क्या कृषकों को योजनाओं में मिलने वाला अनुदान पारदर्शी ढंग से डी बी टी के माध्यम से उसके खाते में जमा होगा बड़ा प्रश्न चिन्ह है?
पूर्व में भी योजनाओं में पारदर्शिता लाने हेतु कई शासनादेश भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर निर्गत किए गए किन्तु राज्य के नौकरशाहों ने कृषकों के हित में किए गए इन शासनादेशों को अपने हित में करने के ही प्रयास किऐ।
 राज्य बनने के बाद सहकारिता को बढ़ावा देने व सरकारी खरीद दारी में पारदर्शिता आये इस उद्देश्य से राज्य सरकार ने विभागीय खरीद सरकारी संस्थाओं /कोपरेटिब के माध्यम से करने के निर्देश दिए। उद्यान विभाग ने योजनाओं में निवेशौ की खरीद फ्रुट फैड हल्द्वानी, नैफेड रुद्रपुर आदि के माध्यम से करना शुरू किया।  सारे निवेश दलालों के माध्यम से किया जाता था केवल बिल इन संस्थाओं के होते थे संस्थाये इनसे कमिशन लेते थे। जब यह बात सार्वजनिक होने लगी तथा शिकायतें हुईं फिर तराई बीज निगम से खरीद के लिए शासनादेश हुये, यहां भी वही हुआ, पैड तराई बीज निगम का तथा खरीद दलालों के माध्यम से।
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भारत सरकार की योजनाओं में सारे निवेश भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केन्द्र तथा राज्य के बीज निगम, केन्द्र तथा राज्य के कृषि अनुसंधान संस्थान एवं विश्व विद्यालय से खरीद के आदेश है।  उत्तराखंड राज्य में सारे निवेश निजी संस्थाओं से क्रय किए जाते हैं शिकायतें होने पर दलालों ने निदेशालय तथा शासन में बैठे नौकरशाहों से मिल कर प्रमुख सचिव कृषि से शासनादेश संख्या /xv1-1/13/5(16)/2013 उद्यान एवं रेशम अनुभाग -1 देहरादून दिनांक 26 जुलाई 2013 को आदेश निर्गत करवाये कि मांग एवं उपलब्धता के अन्तर की पूर्ति हेतु निविदा प्रक्रिया के माध्यम से किऐ जाने निर्देश करवा दिए, जिसके आधार पर सभी निवेश भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि शोध संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय, भारतीय कृषि बीज निगम आदि सरकारी संस्थाओं से न खरीद कर  टैन्डर प्रक्रिया से निजि संस्थाओं के दलालों के माध्यम से खरीदे जाते हैं।
इसी प्रकार एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए की परम्परागत कृषि विकास योजना  के क्रियान्वयन में नहीं हो रहा भारत सरकार की गाइडलाइंस तथा स्वीकृत कार्ययोजना का अनुपालन।
-योजना का उद्देश्य  लघु एवं सीमांत क्षेणी के पर्वतीय एवं बर्षा पर आधारित क्षेत्र के कृषकों की आर्थिक मदद कर स्थानीय परम्परागत फसलों को जैविक मोड़ में ला कर  कृषकों की आय बढ़ाना है ।
किसानों को स्वयंम जैविक बीज,  खाद व कीट- व्याधि नाशक दवाओं के उत्पादन हेतु प्रेरित करने के प्रयास नहीं किये गये और न ही उन्हें इस कार्य हेतु प्रोत्साहन धनराशि उपलब्ध कराई गई।
कृषि/उद्यान विभाग व अन्य सभी कार्य दाई संस्थायें किसानों को खाद, बीज व अन्य निवेश पर दी जाने वाली सब्सिडी को डायरेक्ट टू बैनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) से किसानों को न देकर निजी कम्पनियों से टेन्डर प्रक्रिया दिखा कर निम्न स्तर के निवेश  उच्च कीमतों में क्रय कर किसानों को वांट रहे हैं।
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यदि विभाग को/शासन को सीधे कोई सुझाव/शिकायत भेजी जाती है तो कोई जवाब नहीं मिलता। प्रधानमंत्री /मुख्यमंत्री के समाधान पोर्टल पर सूझाव शिकायत अपलोड करने पर शिकायत शासन से संबंधित विभाग के निदेशक को जाती है। वहां से जिला स्तरीय अधिकारियों को वहां से फील्ड स्टाफ को अन्त में जबाव मिलता है कि किसी भी कृषक द्वारा  कार्यालय में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं है सभी योजनाएं पारदर्शी ठंग से चल रही है।
राज्य में उच्च स्तर पर योजनाओं का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होता है कि विभाग को कितना बजट आवंटित हुआ और अब तक कितना खर्च हुआ।
राज्य में कोई ऐसा सक्षम और ईमानदार सिस्टम नहीं दिखाई देता जो धरातल पर योजनाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन कर  योजनाओं में सुधार ला सके।
योजनाओं का लाभ लेने हेतु कृषकों  को जागरूक होना होगा तथा अपने हक़ की लड़ाई लड़नी होगी वरन् इस राज्य के कृषक ऐसे ही मृगतृष्णा में जीते रहेंगे।
(लेखक उत्तराखंड के कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ हैं।)

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