कोरोना वारियर्स को तीन माह से नहीं मिला वेतन। धनाभाव के बीच जोखिमभरा काम कर रही महिला कर्मी

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आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने उड़ाई श्रम विभाग के आदेश की धज्जियां

मुख्यधारा ब्यूरो/हरिद्वार

जनपद मुख्यालय के अंतर्गत दो सबसे बड़े क्वारंटाईन केन्द्रों में जोखिम भरी परिस्थितियों में काम कर रही नर्सेज को तीन माह से वेतन के लाले पड़े हैं। घर से दूर किराए के घरों में रह रही नर्सेज एवं आउटसोर्सिंग स्टाफ को स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ रहा है।

श्रम विभाग ने लाकडाउन की अवधि में समस्त सरकारी, अर्द्ध सरकारी, स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों आदि को मार्च माह का वेतन 14 अप्रैल तक हरहाल में देने के निर्देश दिए थे। आश्चर्यजनक है कि राज्याधीन उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने श्रम विभाग के आदेश की परवाह करना जरूरी नहीं समझा। वर्तमान में विश्वविद्यालय के ऋषिकुल और गुरुकुल परिसर के अस्पतालों को कोरोना के संदिग्ध लोगों का आइसोलेशन केन्द्र बनाया गया है।

इन केंद्रों में विश्वविद्यालय के नर्सिंग स्टाफ के अलावा विभिन्न नियमित और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को ड्यूटी पर लगाया गया है। केन्द्रों में जोखिम भरी परिस्थितियों में काम कर रहे कार्मिकों को समय पर वेतन देने की परवाह भी विश्वविद्यालय प्रशासन को नहीं है।

जानकारी के अनुसार नर्सिंग स्टाफ के अधिकांश कार्मिकों को जनवरी से मार्च तक का वेतन नहीं दिया गया है। बहुत कम मानदेय पर कार्य करने वाले सफाई व अन्य कर्मचारी भी वेतन को तरसे हुए हैं।

इन कोरोना योद्धाओं को वेतन देने में लापरवाही और कार्मिकों को आर्थिक तंगी में काम के लिए विवश करने वाले विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध श्रम विभाग द्वारा कोई कार्यवाही नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। जिला प्रशासन द्वारा भी कोरोना वारियर्स को समय पर वेतन मिलने या नहीं मिलने का अभी तक संज्ञान नहीं लिया गया है।

 

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सवाल यह है कि सरकार एक तरफ जहां कोरोना योद्धाओं को थाली बजाकर सम्मान देने की बात कहकर चारों तरफ वाहवाही लूटने का प्रयास कर रही है, तो वहीं फ्रंटलाइन के रूप में काम करने वाले इन योद्धाओं को जब समय पर वेतन ही नहीं दिया जा रहा है तो सरकार इन्हें किस तरह का खोखला सम्मान देने की बात कह रही है? अगर कोरोना योद्धाओं के सम्मुख ही वेतन का इस तरह का संकट खड़ा है तो प्राइवेट नौकरी करने वाले आम जनमानस किस तरह  आर्थिक संकट से जूझ रहा होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

सवाल यह भी है कि जब श्रम विभाग के आदेशों का पालन सरकारी विभाग ही नहीं कर रहा है तो निजी व्यवसाय करने वालों पर श्रम विभाग के आदेश का कितना असर हो रहा होगा, महसूस किया जा सकता है। इस प्रकार आयुर्वेद विश्वविद्यालय अपने कर्मचारियों को विगत 3 माह से वेतन नहीं दिया और वह श्रम विभाग के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा है।

बहरहाल देखना यह है कि संबंधित विभाग कोरोना योद्धा के रूप में काम करने वाले इन कर्मचारियों के वेतन को लेकर कब तक निर्णय ले पाता है।

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