दु:खद : corona भी नहीं मिटा पा रहा छुआछूत की भावना। क्वारंटीन सेंटर में एससी भोजनमाता के हाथ का खाना खाने से इंकार

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वीडियो में देखिए इस प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार की प्रतिक्रिया
छुआछूत तो corona से करें, अनुसूचित जाति की भोजनमाता से परहेज क्यों?

मामचन्द शाह
नैनीताल। एक ओर वैश्विक महामारी corona के खौफ ने समाज में भाईचारे की एक नई मिसाल पेश की है, तो वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी जातिगत छुआछूत की भावना को इस संकटकाल में भुलाने की बजाय जीवंत करने का प्रयास किया जा रहा है। ताजा मामला नैनीताल जनपद से सामने आया है, जहां सवर्ण जाति के लोग अनुसूचित जाति की भोजनमाता के हाथ से बने खाना खाने से इंकार कर रहे हैं।
सर्वविदित है कि बाहर से लौटने वाले प्रवासी उत्तराखंडियों को क्वारंटीन की व्यवस्था का जिम्मा ग्राम प्रधानों को दिया गया है। प्रवासियों की क्वारंटीन व्यवस्था स्कूलों, पंचायत/सामुदायिक भवनों या नजदीकी अन्य सेंटर पर की जा रही है। ऐसे में नैनीताल जनपद के अंतर्गत विकासखंड ओखलकांडा के भुमका गांव में भी स्कूल में क्वारंटीन सेंटर बनाया गया है। इस सेंटर में भोजनमाता अनुसूचित जाति की है। जब दो सवर्ण जाति के लोगों को यहां खाना दिया गया तो उन्होंने अनु. जाति की भोजनमाता के हाथों से बना खाना खाने से साफ इंकार कर दिया और वे अपने घरों से खाना मंगाकर खाने लगे। उन्हें ग्राम प्रधान व अन्य जागरूक लोगों द्वारा समझाया गया, लेकिन वे नहीं माने। इस पर इसकी शिकायत क्षेत्रीय पटवारी को कर दी गई।
ग्राम प्रधान मुकेश चन्द्र बौद्ध बताते हैं कि नाई पट्टी के पटवारी से शिकायत की गई है। प्रधान ने दोनों सवर्णों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
सवाल यह है कि जब पूरी मानव सभ्यता ही corona के कारण खतरे में पड़ी हुई है तो फिर कुछ लोगों को अभी भी जातीय भेदभाव के भंवर में फंसने की आवश्यकता क्या है।
इस ज्वलंत मामले पर वरिष्ठ पत्रकार गजेंद्र रावत ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा करते हैं। आइए देखिए उन्होंने वीडियो में किस प्रकार अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया है:-

सवाल यह है कि जिस देश में अनुसूचित जाति के प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक खुशी-खुशी स्वीकार कर लिए जाते हैं, वहीं एससी भोजनमाता के हाथ का खाना खाने से इंकार किया जाना पूरी देवभूमि को शर्मसार कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड एक ऐसी भूमि है, जहां देवों का वास स्थान कहा जाता है। स्वाभाविक है कि जहां देवस्थल हों, वहां भेदभाव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यानि की देवताओं के लिए समस्त मानव जाति एक है। लेकिन कटु सत्य है कि इसी देवभूमि में सदियों से अनुसूचित जाति के लोगों के साथ ऐसे अत्याचार व भेदभाव होते रहे हैं, जिसको सुनकर आज भी लोग दंग रह जाते हैं, लेकिन शिक्षा का स्तर बढऩे के साथ ही भेदभाव भी कम होता चला गया।
पूरे विश्व में कोविड-19 के आंकड़ों को देखते हुए सही मायनों में असली छुआछूत तो corona से की जानी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य है कि अभी भी एससी वर्ग के कर्मचारियों के साथ ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। उपरोक्त प्रकरण से भोजनमाता को भी मानसिक आघात अवश्य पहुंचा होगा। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई। समाज को जरूरत है अपने विचारों में व्यावहारिकता और बदलाव लाने की, जिससे देवभूमि भाईचारे की इस मिसाल से गौरवान्वित हो सके।
कुल मिलाकर संकट का वर्तमान दौर सामाजिक समरसता को स्थापित करने का है। corona संकट का यह दौर सदियों पुरानी छुआछूत जैसी बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए इससे बेहतर समय और कोई दूसरा नहीं हो सकता है।

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