निरंकुश सत्ता – लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु
नीरज उत्तराखंडी/उत्तरकाशी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि सत्ता जनता की होती है और सरकार केवल उसकी संरक्षक होती है। लेकिन जब यही सत्ता स्वयं को जनता से ऊपर समझने लगे, सवालों को अपराध मानने लगे, आलोचना को देशद्रोह बताने लगे और संस्थाओं को अपने हितों के अनुसार संचालित करने लगे, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे निरंकुशता की ओर बढ़ने लगता है।
निरंकुश सत्ता कभी एक दिन में पैदा नहीं होती। वह धीरे-धीरे विकसित होती है। पहले वह विपक्ष को कमजोर करती है, फिर स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता पर प्रभाव डालती है, मीडिया पर दबाव बढ़ता है, असहमति रखने वालों को बदनाम किया जाता है और अंततः नागरिकों में ऐसा भय पैदा किया जाता है कि वे बोलने से पहले सौ बार सोचें। यही लोकतंत्र के क्षरण की शुरुआत होती है।
निरंकुश सत्ता की पहली पहचान है – जवाबदेही से बचना
लोकतांत्रिक सरकारें जनता के प्रश्नों का उत्तर देती हैं, जबकि निरंकुश प्रवृत्ति वाली सत्ता प्रश्न पूछने वालों की मंशा पर सवाल उठाती है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार जैसे मूल मुद्दों से ध्यान हटाकर भावनात्मक विमर्श खड़े किए जाते हैं ताकि शासन के वास्तविक प्रदर्शन पर चर्चा न हो।
दूसरी पहचान है- संस्थाओं का केंद्रीकरण
जब निर्णय कुछ व्यक्तियों तक सीमित हो जाएँ और संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय सत्ता की इच्छा के अनुरूप चलने लगें, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है। लोकतंत्र की ताकत संस्थाओं की स्वतंत्रता में है, न कि किसी एक व्यक्ति या दल की सर्वशक्तिमान छवि में।
तीसरी विशेषता है – असहमति के प्रति असहिष्णुता
लोकतंत्र में विरोध शत्रुता नहीं, बल्कि सुधार का अवसर होता है। यदि पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, छात्र या विपक्ष केवल इसलिए संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगें क्योंकि वे सवाल पूछते हैं, तो यह स्वस्थ लोकतंत्र का नहीं, बल्कि निरंकुश प्रवृत्ति का संकेत है।
चौथी पहचान है – व्यक्तिपूजा का बढ़ना
जब नीतियों से अधिक व्यक्तियों का महिमामंडन होने लगे, जब सरकार और राष्ट्र के बीच की सीमाएँ धुंधली कर दी जाएँ, तब लोकतांत्रिक संस्कृति को गहरी क्षति पहुँचती है। लोकतंत्र व्यक्तियों पर नहीं, संस्थाओं और संविधान पर टिका होता है।
निरंकुश सत्ता का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि जनता धीरे-धीरे अपने अधिकार खोने लगती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित होती है, पारदर्शिता कम होती है, भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका पैदा होती है और नीति-निर्माण में विविध मतों के लिए स्थान घटता जाता है। जब सत्ता के पास असीमित अधिकार हों और उस पर प्रभावी नियंत्रण न हो, तब गलत निर्णयों की कीमत पूरा समाज चुकाता है।
इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र बाहरी आक्रमणों से कम, भीतर पनपती निरंकुश प्रवृत्तियों से अधिक कमजोर हुआ है। इसलिए संविधान ने सत्ता के विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक स्वतंत्रताओं जैसी व्यवस्थाएँ केवल औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि निरंकुशता पर अंकुश लगाने के लिए बनाई हैं।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को शासन करने का वैध अधिकार होता है। किसी सरकार की आलोचना और उसकी वैधता पर प्रश्न उठाना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का सम्मान और उसकी जवाबदेही-दोनों साथ-साथ चलते हैं।
लोकतंत्र का भविष्य केवल चुनाव जीतने से सुरक्षित नहीं होता। वह तब सुरक्षित होता है जब सत्ता स्वयं को संविधान से बड़ा न माने, संस्थाएँ निर्भीक रहें, मीडिया स्वतंत्र रहे, न्यायपालिका निष्पक्ष रहे और नागरिक बिना भय के अपनी बात कह सकें। जिस दिन प्रश्न पूछना अपराध और सत्ता की आलोचना जोखिम बन जाए, उसी दिन लोकतंत्र का स्वास्थ्य गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
लोकतंत्र की रक्षा किसी एक दल, नेता या संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, विपक्ष, मीडिया, न्यायपालिका और सबसे बढ़कर जागरूक नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है। क्योंकि निरंकुश सत्ता कभी अचानक नहीं आती-वह तब जन्म लेती है जब समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है और सत्ता उत्तर देना।
(लेखक मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


