- सवाल : कानून कड़ा, लेकिन न्याय की राह लंबी!
- अस्पृश्यता के 800 मामले दर्ज, 793 अब भी लंबित
- यूपी में सबसे ज्यादा 426 केस, महाराष्ट्र दूसरे और गुजरात तीसरे स्थान पर
- सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट ने व्यवस्था की रफ्तार पर उठाए सवाल
नई दिल्ली/देहरादून, मुख्यधारा
संविधान ने दशकों पहले अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर दिया, कानून में सजा का प्रावधान है, पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता की व्यवस्था है और दोषियों को सजा दिलाने के लिए विशेष न्यायालय तक बनाए गए हैं। बावजूद इसके अस्पृश्यता से जुड़े मामलों में न्याय की मंजिल अभी दूर दिखाई देती है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े व्यवस्था की इसी चुनौती को सामने रखते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में कुल 800 मामले दर्ज किए गए। इनमें महज 7 मामलों में दोषमुक्ति हुई, जबकि 793 मामले लंबित हैं।
यूपी में आधे से ज्यादा मामले
आंकड़ों में उत्तर प्रदेश 426 मामलों के साथ पहले स्थान पर है। सात राज्यों में दर्ज कुल मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 53.3 प्रतिशत है।
इसके बाद महाराष्ट्र में 166 मामले दर्ज हुए, जबकि गुजरात 102 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। बिहार में 71, हिमाचल प्रदेश में 19, जम्मू-कश्मीर में 13 और दिल्ली में तीन मामले दर्ज किए गए।
- राज्य| मामले दर्ज| दोषमुक्त| लंबित
- उत्तर प्रदेश| 426| 0| 426
- महाराष्ट्र| 166| 0| 166
- गुजरात| 102| 4| 98
- बिहार| 71| 0| 71
- हिमाचल प्रदेश| 19| 2| 17
- जम्मू-कश्मीर| 13| 1| 12
- दिल्ली| 3| 0| 3
- कुल| 800| 7| 793
99 फीसदी से ज्यादा मामले लंबित
रिपोर्ट के आंकड़ों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुल 800 मामलों में से 793 यानी करीब 99.1 प्रतिशत मामले लंबित हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी मामले का लंबित होना आरोपी को दोषी मानने के बराबर नहीं है। लेकिन मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी जरूर होती है।
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में दर्ज क्रमशः 426 और 166 मामलों में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक भी मामला दोषमुक्ति के रूप में दर्ज नहीं है और सभी मामले लंबित बताए गए हैं।
विशेष न्यायालय भी, फिर देरी क्यों?
अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी भी प्रकार की अक्षमता के शिकार व्यक्तियों को कानूनी सहायता दिलाने, अभियोजन शुरू करने अथवा अभियोजन की निगरानी करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति जैसे उपाय कानून में किए गए हैं।
दोषियों को सजा दिलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना भी की गई है। कई राज्यों ने मामलों की निगरानी के लिए समितियां भी गठित की हैं।
इसके बावजूद जब मामलों का इतना बड़ा हिस्सा लंबित हो, तो सवाल केवल कानून का नहीं, बल्कि कानून को जमीन पर लागू करने की क्षमता और न्यायिक प्रक्रिया की गति का भी बन जाता है।
कागज पर बराबरी, जमीन पर भेदभाव?
अस्पृश्यता केवल एक कानूनी शब्द नहीं है। यह उस सामाजिक मानसिकता का नाम है जिसमें किसी व्यक्ति को उसकी जाति या सामाजिक पहचान के कारण बराबरी से वंचित किया जाता है।
कानून ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर दिया, लेकिन सामाजिक व्यवहार में बदलाव की रफ्तार कानून से कहीं धीमी दिखाई देती है। यही कारण है कि आज भी ऐसे मामले दर्ज हो रहे हैं।
मंत्रालय के आंकड़े यह सोचने को मजबूर करते हैं कि क्या केवल कानून और विशेष न्यायालय पर्याप्त हैं? जब तक पीड़ित बिना भय शिकायत दर्ज न करा सके, पुलिस निष्पक्षता से जांच न करे, अभियोजन प्रभावी ढंग से पैरवी न करे और अदालतों में मामलों का समयबद्ध निस्तारण न हो, तब तक संवैधानिक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा।
सवाल आंकड़ों से आगे का है
इन 800 मामलों के पीछे केवल मुकदमे की संख्या नहीं, बल्कि 800 परिवारों की पीड़ा, सम्मान और न्याय की उम्मीद जुड़ी हो सकती है। इसलिए असली चुनौती यह नहीं कि कितने मामले दर्ज हुए, बल्कि यह है कि उनमें से कितने मामलों में पीड़ितों को समय पर न्याय मिला।
कानून की किताब में अस्पृश्यता अपराध है, लेकिन समाज में उसका कोई भी रूप बचा रहना लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।
अब जरूरत सिर्फ नए प्रावधान बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा कानून को प्रभावी, तेज और जवाबदेह तरीके से लागू करने की है। तभी आंकड़ों में दर्ज ये मामले महज सरकारी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की कहानी बन सकेंगे।


