- चूल्हे की चिंगारी में जल गया पार्वती देवी का अंतिम सहारा
- बैंक में लाखों की जमा पूंजी, फिर भी लकड़ी के चूल्हे पर निर्भर थीं बुजुर्ग महिला, आराकोट अग्निकांड ने खोली दुर्गम क्षेत्रों की अग्निशमन व्यवस्था की पोल
नीरज उत्तराखंडी/आराकोट, बंगाण, उत्तरकाशी
स्वास्थ्य विभाग में वर्षों तक सेवा करने के बाद जीवन के अंतिम पड़ाव में पहाड़ की एकांत घाटी में आध्यात्मिक जीवन बिता रहीं बुजुर्ग पार्वती देवी ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि जिस चूल्हे पर वह रोज भोजन पकाती थीं, उसी की एक चिंगारी उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय लिख देगी। आराकोट में हुए भीषण अग्निकांड में पुराने स्वास्थ्य केंद्र भवन के भीतर जिंदा जली पार्वती देवी के शव के कुछ अवशेष बरामद हुए हैं, जिन्हें डीएनए सैंपलिंग के लिए सुरक्षित रखा गया है।
लोग उन्हें ‘जैन माता’ के नाम से जानते थे। पति की मृत्यु के बाद वह आराकोट में अकेले रह रही थीं। स्वास्थ्य विभाग से वर्ष 2006-07 के आसपास सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने नए स्वास्थ्य केंद्र भवन के निर्माण के पश्चात पुराने और जीर्ण-शीर्ण भवन में ही अपना आशियाना बना लिया था। यहीं वह एकांत और आध्यात्मिक जीवन गुजार रही थीं।
लाखों की जमा पूंजी, लेकिन रसोई में जंगल की लकड़ी
बताया जा रहा है कि सेवाकाल के दौरान मिले वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, जीपीएफ आदि की करीब 40 लाख रुपये से अधिक की राशि उनके बैंक खाते में जमा थी। लेकिन जीवन की विडंबना देखिए कि बैंक में लाखों रुपये होने के बावजूद वह भोजन पकाने के लिए जंगल से लकड़ी बीनकर लाती थीं और लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती थीं।
सामाजिक कार्यकर्ता मनमोहन सिंह चौहान के अनुसार पार्वती देवी बेहद सादा जीवन जीती थीं। आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद उनका जीवन बेहद साधारण था। कुछ समय से वह लोगों से भिक्षा मांगकर भी अपना गुजारा करती थीं।
इकलौती बेटी भी नहीं पहुंच सकी अंतिम विदाई देने
पार्वती देवी की एक इकलौती पुत्री बताई जा रही है। लेकिन अग्निकांड में उनकी दर्दनाक मौत के बाद परिस्थितियां ऐसी रहीं कि बेटी अपनी मां को अंतिम विदाई देने के लिए भी मौके पर नहीं पहुंच सकी। पहाड़ के दुर्गम भूगोल, दूरी और परिस्थितियों के बीच एक मां का अंतिम संस्कार भी परिवार के लिए पीड़ा और असहायता का विषय बन गया।
आराकोट की इस घटना ने सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत का दुख नहीं दिया, बल्कि यह सवाल भी छोड़ दिया है कि क्या दुर्गम क्षेत्रों में अकेले रह रहे बुजुर्गों की सुरक्षा और देखभाल के लिए व्यवस्था पर्याप्त है?
पुराने स्वास्थ्य केंद्र भवन पर भी उठे सवाल
स्थानीय लोगों के अनुसार करीब 15 वर्ष पहले स्वास्थ्य विभाग ने पुराने और जीर्ण-शीर्ण स्वास्थ्य केंद्र भवन के समीप नया भवन तैयार किया था। इसके बाद राजकीय अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का संचालन नए भवन से होने लगा, जबकि पुराना भवन उपयोग से बाहर हो गया।
इसके बावजूद पुराने भवन में पार्वती देवी अकेली रह रही थीं। आग की घटना ने इस भवन की स्थिति, वहां रहने की अनुमति अथवा व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि यदि पुराना भवन जर्जर और अनुपयोगी था तो उसमें किसी व्यक्ति का लंबे समय तक रहना कैसे जारी रहा? स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन को इस पहलू की भी जांच करनी चाहिए।
200 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय, आग बुझाने के लिए इंतजार कितना?
आराकोट बंगाण क्षेत्र के लिए अग्निकांड ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया है—क्या दुर्गम सीमांत कस्बों में आग जैसी आपदा से निपटने के लिए पर्याप्त व्यवस्था है?
जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से आराकोट की दूरी करीब 200 किलोमीटर बताई जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता मनमोहन सिंह चौहान ने आराकोट में स्थायी अग्निशमन केंद्र स्थापित करने की मांग की है।
उनका कहना है कि आराकोट सीमावर्ती बंगाण क्षेत्र के कई गांवों का प्रमुख केंद्र है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में ग्रामीण खरीदारी और अन्य कामों के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में आग जैसी आपात स्थिति में तत्काल अग्निशमन सुविधा उपलब्ध होना बेहद जरूरी है।
उनके अनुसार आराकोट के आसपास त्यूणी, मोरी और हिमाचल प्रदेश के जुब्बल क्षेत्र में अग्निशमन संसाधन उपलब्ध हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी मार्गों के कारण आपात स्थिति में मौके तक पहुंचने में समय लग सकता है। आग के मामले में शुरुआती कुछ मिनट ही अक्सर सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
एक मौत से बड़ा सवाल—क्या पहाड़ के दुर्गम कस्बे सुरक्षित हैं?
आराकोट की यह घटना सिर्फ एक अग्निकांड भर नहीं है। यह उस पहाड़ी व्यवस्था का आईना भी है जहां एक ओर किसी बुजुर्ग के बैंक खाते में जीवनभर की कमाई जमा रहती है, लेकिन दूसरी ओर वह रोजमर्रा की जरूरत के लिए जंगल से लकड़ी बीनने को मजबूर है।
एक ओर स्वास्थ्य विभाग का नया भवन बन जाता है, दूसरी ओर पुराना भवन वर्षों तक खड़ा रहता है। एक ओर प्रशासनिक तंत्र आपदा प्रबंधन के लिए योजनाएं बनाता है, दूसरी ओर दूरस्थ कस्बों में अग्निशमन जैसे बुनियादी संसाधनों की उपलब्धता अब भी सवालों के घेरे में है।
पार्वती देवी की मौत की पूरी तस्वीर जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन उनकी दर्दनाक कहानी कई सवाल पीछे छोड़ गई है—क्या दुर्गम क्षेत्रों में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की नियमित निगरानी होती है? क्या अनुपयोगी सरकारी भवनों की सुरक्षा जांच होती है? और क्या आराकोट जैसे सीमांत कस्बे में आग लगने पर तत्काल सहायता पहुंचाने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं?
इन सवालों के जवाब अब सिर्फ पार्वती देवी के परिवार को नहीं, बल्कि पूरे बंगाण क्षेत्र को चाहिए।


