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राम मंदिर के लिए कल्याण सिंह (Kalyan Singh) ने मारी थी सत्ता को ठोकर

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राम मंदिर के लिए कल्याण सिंह (Kalyan Singh) ने मारी थी सत्ता को ठोकर

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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

कल्याण सिंह की गिनती देश के मंझे और मजबूत राजनेताओं में होती है। कल्याण सिंह से जुड़े ऐसे बहुत से किस्से हैं जिनमें उनकी कार्यशैली की छाप, राजनीतिक समझ, राम मंदिर आंदोलन से उनके राजनीतिक उभार और अपनी सरकार कुर्बान कर देने के फैसले से राजनीतिक त्याग का पता चलता है। लेकिन, इनके अलावा ऐसे और भी किस्से हैं जो उनके राजनीतिक जीवन की अहम घटनाओं के रूप में शुमार होते हैं। कल्याण सिंह 1967 में पहली बार अतरौली से विधायक बने थे। कल्याण सिंह 10 बार विधायक चुने गए। उत्तर प्रदेश के पूर्व कल्याण सिंह 2 बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे। कल्याण सिंह ने 19991में अपने दम पर यूपी में सरकार बनाई थी। इसके बाद कल्याण सिंह यूपी में भाजपा के पहले सीएम बने। वह भाजपा के यूपी में पहले सीएम भी थे। पहले कार्यकाल में 24 जून 1991 से 6 दिसम्बर 1992 तक और दूसरी बार 21 सितंबर 1997 से 12 नवंबर 1999 तक मुख्यमंत्री रहे। जनता उन्हें देश की राजनीति में हिंदुत्व के नायक का खिताब देते हैं।

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कल्याण सिंह ने पद पर बने रहने के लिए कभी उसूलों से समझौता नहीं किया। इंटर कॉलेज के टीचर से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल बनने तक का सफर उनके लिए कांटों भरा रहा। जिस वक्त भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ उस वक्त कल्याण सिंह प्रदेश संगठन में पदाधिकारी बनाए गए। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में जान फूंकनी शुरू की। उनकी सक्रियता से बीजेपी को यूपी में काफी मजबूती मिली। 90 के दशक में देश की राजनीति मंडल और कमंडल के इर्द-गिर्द घूमने लगी। 1991 में विधानसभा चुनाव हुआ तो यूपी में बीजेपी की सरकार बनी। यहां के
सीएम कल्याण सिंह बने। उनके सीएम बनने से लोगों में राम मंदिर निर्माण के लिए एक आस की किरण दिखी। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन के चेहरे के रुप में उभरे, इससे बीजेपी का राम भक्तों की पार्टी के तौर पर पहचान मिली।

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वहीं 6 दिसंबर 1992 में जब तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह अपने घर पर बैठ कर टीवी देख रहे थे उस वक्त कारसेवकों के द्वारा विवादित बाबरी दांचा को गिराया जा रहा था। वहीं त्कालीन डीजीपी सीएम से मिलने उनके आवास पर पहुंचे। कल्याण सिंह से उन्होंने इस मामले में कार्रवाई करने की मांग की। सीएम कल्याण सिंह ने उन्हें लाठी-डंडे और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल करने की छूट तो दी लेकिन करसेवकों पर फायरिंग करने की इजाजत नहीं दी। डीजीपी इस मामले में कोई कार्रवाई करते इसके पहले ही करसेवकों ने बाबरी ढांचा को गिरा दिया था। गौरतलब हो कि,इस घटना के बाद कल्याण सिंह ने गर्व से पूरी घटना की जिम्मेदारी ली और राम मंदिर आंदोलन के लिए अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार कुर्बान कर दी।

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कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंप दिया। वहीं अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि, “मैं यूपी का सीएम था। जो हुआ,उसकी मैं पूरी तरह जिम्मेदारी लेता हूं। ढांचा गिर गया तो मैंने उसकी कीमत चुकाई। मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। अभी और क्या कोई हमारी जान लेगा? राम मंदिर बनाने की खातिर एक क्या 10 बार सरकार कुर्बान करनी पड़ेगी तो करेंगे।” लगभग 500 वर्षों के इंतजार के बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का सपना साकार होने हीं वाला है। राम मंदिर में प्रभु श्री राम के मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम 22 जनवरी को है। भारत के प्रधानमंत्री और बीजेपी नेता के द्वारा यह शुभ कार्य होना है। राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर देशवासियों के बीच उत्साह है। सभी अपने राम के स्वागत के लिए बेताब हैं। वहीं दूसरी ओर राम मंदिर को लेकर राजनीति भी खूब हो रही है। विपक्ष केंद्र सरकार पर कई तरह के आरोप लगा रही है।

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विपक्ष का मनना है कि बीजेपी राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेकर चुनाव जीतना चाहती है। वहीं कई नेताओं ने  कहा है कि, मंदिर के जगह अस्पताल और विश्वविद्यालय का निर्माण होना चाहिए था। लेकिन अगर देखा जाए तो राम मंदिर का निर्माण होना इतना आसान नहीं था। राम मंदिर के निर्माण के लिए कई सालों तक आंदोलन किए गए हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए कई लोगों ने अपनी जान भी दी है। राम मंदिर आंदोलन में शामिल हुए थे। इन्हीं नेताओं में से एक थे यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह। कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरे थे और अपने समय में यूथ आइकन थे। उस समय यूपी के युवाओं ने कल्याण सिंह के लिए नारा भी दिया था जोकि अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। “कल्याण सिंह कल्याण करो, मंदिर का निर्माण करो।” उस समय पूरे यूपी में इसकी गूंज सुनाई देती थे। वहीं आज जब राम मंदिर का निर्माण अपनी अंतिम रुप में है ऐसे में कल्याण सिंह को याद करना स्वभाविक है।

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बता दें कि, आज यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का 92वीं जंयती है। वह  2 बार यूपी के सीएम बने। कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काफी सुधार किए थे। उनकी सरकार में राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री थे। तब उस समय कल्याण सिंह की सरकार में नकल अध्यादेश लागू हुआ था। इस अध्यादेश के बाद हाईस्कूल में 14.70 प्रतिशत तो इंटर में 30.30 प्रतिशत छात्र-छात्राएं ही पास हुए थे। उस समय के लोग आज भी एक-दूसरे से ये पूछते हैं कि कल्याण सिंह की सरकार में पास हुए हो या मुलायम की। क्योंकि कल्याण सिंह के समय पास होना बहुत बड़ी बात होतीथी। कल्याण सिंह 4 सितंबर 2014 से 8 सितंबर 2019 तक राजस्थान के राज्यपाल रहे। इसके साथ ही कल्याण सिंह ने 28 जनवरी 2015 से 11 अगस्त 2015 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सम्भाला था। वहीं कल्याण सिंह ने राजस्थान में बतौर राज्यपाल रहते हुए 52 साल का रिकॉर्ड तोड़ा था। कल्याण सिंह को स्वयंसेवक बनाया थे। कल्याण सिंह संघ के तहसील कार्यवाह रहे। बाद में जनसंघ के संगठन मंत्री रहे।

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कल्याण सिंह उस पीढ़ी के नेताओं में थे जिन्होंने साइकिल चलाकर संगठन का काम किया था। अलीगढ़ की अतरौलरी से 1962 में जनसंघ से चुनाव लड़े लेकिन हार गये दुबारा लड़े और विजयी हुए। तब से लगातार आठ बार वह विधायक चुने गये। वह जमीन से जुड़े राजनेता और कुशल प्रशासक थे। वह जननेता इसलिए बने कि कथनी और करनी में फर्क नहीं था उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसी रेखा खींची जिसकी बराबरी करना सबके बस की बात नहीं। कल्याण सिंह ने स्कूलों में भारत माता की प्रार्थना और वंदे मातरम् को अनिवार्य कर दिया था। राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ थे संघ की नजर में कल्याण सिंह शुरू ही थे। वह उन चंद नेताओं में शामिल थे जो संघ की विचार धारा को तेजी से आगे बढ़ा रहे थे। पार्टि में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ साथ वह जातिगत क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ बना रहे थे। पिछड़ी जाति से होने के बावजूद वह तेजी से हिंदूवादी नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे थे। 1977 के आपातकाल के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र में एक मजबूत पकड़ बनाई रखी और लगातार चुनाव जीतते रहे।

( लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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