जब खेत बदले, जंगल बदले तो भूखे हो गए पहाड़ के पक्षी

Mukhyadhara
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जब खेत बदले, जंगल बदले तो भूखे हो गए पहाड़ के पक्षी

नीरज उत्तराखंडी

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों एक ऐसी पर्यावरणीय समस्या तेजी से गहराती जा रही है, जिस पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती हो। यह समस्या है—पक्षियों के लिए बढ़ता आहार संकट। पहाड़ों के खेतों और जंगलों में आए बदलावों ने पक्षियों की प्राकृतिक भोजन श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। परिणाम यह है कि अनेक पक्षी अब अपने पारंपरिक भोजन से वंचित होकर सेब और अन्य फलों के बागानों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे किसानों को भी भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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एक समय था जब उत्तराखंड के गांवों में गेहूं, जौ, मड़वा (रागी), झंगोरा, मक्का और रामदाना जैसी पारंपरिक फसलें बड़े पैमाने पर बोई जाती थीं। कटाई के बाद खेतों में बिखरे दाने महीनों तक गौरैया, तीतर, चकोर, फाख्ता, बुलबुल और अनेक अन्य पक्षियों के लिए भोजन का प्रमुख स्रोत होते थे। खेत केवल किसानों की आजीविका नहीं थे, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के पोषण का आधार थे।

 

आज स्थिति बदल चुकी है। पलायन, खेती से घटती आय, जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक और श्रमिकों की कमी ने पारंपरिक खेती को लगभग समाप्त कर दिया है। हजारों खेत बंजर पड़े हैं। इनके साथ ही पक्षियों का प्राकृतिक भोजन भी गायब हो गया।

दूसरी ओर जंगलों की तस्वीर भी बदली है। काफल, किगोड़ हिंसाल और अन्य जंगली फलदार प्रजातियों की संख्या लगातार घट रही है। जंगलों में चीड़ का बढ़ता विस्तार, जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और जंगलों की बदलती संरचना ने इन पौधों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है। जिन फलों पर पहाड़ के पक्षियों का जीवन निर्भर था, वे अब पहले जैसे उपलब्ध नहीं हैं।

#ऐसी स्थिति में पक्षियों के सामने भोजन का संकट खड़ा होना स्वाभाविक है। वे वहां जाएंगे, जहां भोजन मिलेगा। यही कारण है कि आज सेब के बागानों में पक्षियों की संख्या बढ़ती दिखाई देती है। किसान इसे केवल “नुकसान” के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह प्रकृति का संकट है। पक्षी किसान के दुश्मन नहीं बने हैं, बल्कि परिस्थितियों ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया है।

विडंबना यह है कि समाधान केवल पक्षियों को भगाने या जाल लगाने में खोजा जा रहा है। यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। यदि प्राकृतिक भोजन स्रोत समाप्त होते रहेंगे, तो पक्षियों और किसानों के बीच संघर्ष और बढ़ेगा।

सरकार की कृषि और वन नीति को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा। परती खेतों को फिर से पारंपरिक खेती से जोड़ने, मोटे अनाजों को प्रोत्साहित करने और जंगलों में काफल, किंगोड़, हिंसाल तथा अन्य स्थानीय फलदार प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण करने की आवश्यकता है।

यही नहीं, कृषि, वन और जैव विविधता विभागों को मिलकर पक्षियों के संरक्षण और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाने की दीर्घकालिक योजना तैयार करनी होगी।

पक्षी केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि वे बीजों के प्रसार, परागण और कीट नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि उनकी भोजन श्रृंखला टूटती है, तो उसका प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा।

पहाड़ की खेती, जंगल और पक्षी- ये तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। यदि खेत सूने होंगे और जंगलों में फल नहीं होंगे, तो पक्षी बागानों में आएंगे ही। इसलिए सेब को बचाने का सबसे प्रभावी उपाय पक्षियों को भगाना नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक भोजन को वापस लौटाना है।

प्रकृति का संतुलन तभी बचेगा, जब विकास की योजनाओं में खेत, जंगल और पक्षियों- तीनों के अस्तित्व को समान महत्व दिया जाएगा। यही उत्तराखंड के पर्वतीय पर्यावरण और कृषि का स्थायी भविष्य है।

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