राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अक्खड़पन विश्व को खटक रहा, भारत और अमेरिका के रिश्तों में भी पहले जैसी गर्माहट नहीं

admin
j 1 21

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अक्खड़पन विश्व को खटक रहा, भारत और अमेरिका के रिश्तों में भी पहले जैसी गर्माहट नहीं

शंभू नाथ गौतम

12 दिनों तक ईरान और इजरायल के बीच चले युद्ध के बाद युद्ध विराम की स्थित है। दोनों देशों में शांति समझौता (सीजफायर) कराने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पूरी दुनिया भर में एक बार फिर श्रेय लेने में लगे हुए हैं। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को खत्म कराने के लिए कई बार अपनी पीठ थपथपा चुके हैं। यही नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत और पाकिस्तान को एक तराजू में तौला बल्कि डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को ज्यादा महत्व दिया । अमेरिका का पाकिस्तान की ओर झुकाव भारत पसंद नहीं आया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पहले जैसे दोस्ती भी कमजोर पड़ी है। हाल के कुछ समय में दोनों नेताओं के बीच कई बार टेलीफोन से बात हुई लेकिन रिश्तों में गर्माहट नहीं आ पाई। “भारत सरकार की ओर से पाकिस्तान के मामले में कई बार अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान का सार्वजनिक रूप से विरोध भी किया।

यह भी पढ़ें : रुद्रप्रयाग जनपद में दर्दनाक हादसा : अलकनंदा नदी में टेंपो ट्रैवलर के गिरने से एक की मौत, सात घायल, 12 यात्री लापता, रेस्क्यू जारी

पिछले दिनों ओडिशा दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से कहा था मैं डोनाल्ड ट्रंप का निमंत्रण ठुकरा कर भगवान जगन्नाथ की धरती पर आया हूं “। वहीं प्रधानमंत्री मोदी भी डोनाल्ड ट्रंप से सचेत हैं और नया दोस्त भी तलाश रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तमाम देशों में दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है। ईरान, इजरायल की बीच भले ही फिलहाल शांति का माहौल कायम है लेकिन दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से शायद ही सहमत हो। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को फिर से महान बनाने की मुहिम में अपने को हर मोर्चे पर मजबूत करने में लगे हैं। इस बार ट्रंप की आक्रामक नीति और अक्खड़ स्वभाव भी भारत समेत कई देशों को खटकने लगा है। अमेरिका को ‘फिर से महान बनाने के अभियान’ में लगा ट्रंप प्रशासन ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए किसी जमीनी युद्ध में नहीं उलझना चाहता, परंतु उसके इरादों को देखते हुए भारत को सतर्क होना होगा।

भारत को सामरिक दृष्टिकोण से भी इस युद्ध के निहितार्थ समझने की आवश्यकता है। इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान व्हाइट हाउस में ट्रंप की ओर पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की आवभगत का एक गहरा अर्थ है। जब मुनीर व्हाइट हाउस में थे, लगभग उसी समय अमेरिकी मदद से सत्तासीन बांग्लादेश की भारत विरोधी मोहम्मद यूनुस सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों से मिल रहे थे। दरअसल ट्रंप की मागा योजना के अंतर्गत अमेरिका का नए सिरे से जो उद्योगीकरण प्रस्तावित है, वह बिना चीन और रूस के पर कतरे और भारत को तंग किए बिना संभव नहीं है।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड : इन आईएएस अधिकारियों के दायित्वों में हुआ फेरबदल

इस योजना को सिरे चढ़ाना उतना आसान नहीं है, क्योंकि भूमंडलीकरण के नाम पर अमेरिका ने ही अधिक मुनाफा कमाने के फेर में अपनी कंपनियों को चीन, वियतनाम जैसे देशों में स्थापित कराया। अब जब तक इन देशों में अमेरिकी कंपनियों के लिए उत्पादन के मोर्चे पर चुनौतियां नहीं दिखतीं, तब तक उनकी स्वदेश वापसी मुश्किल है। फिर भी अपनी योजना को लेकर अमेरिकी नवरूढ़िवादियों और ट्रंप के कथित युद्धविरोधी मागा खेमे में एक राय है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दो तरीके चुने गए हैं। पहला तरीका है ट्रेड और टैरिफ नीति के जरिये रूस, चीन के साथ-साथ भारत का भी आर्थिक संकट बढ़ाना। दूसरा तरीका है कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियों का अपने हित में इस्तेमाल करना। ट्रंप के चीनी वस्तुओं पर लगाए गए भारी टैरिफ के चलते चीन का अमेरिका को निर्यात काफी घटा है। यदि यह सिलसिला लंबे समय तक चला और चीन ने अपने निर्यात के लिए नए बाजार नहीं तलाशे तो वहां बड़ा औद्योगिक और सामाजिक संकट खड़ा हो सकता है।

यह भी पढ़ें : प्रदेश में सीएम हेल्पलाइन 1905 में 180 दिन से अधिक समय से लंबित शिकायतों के समाधान के लिए चलेगा विशेष अभियान

भारत चीन के विरुद्ध एक तरह से अमेरिका का सामरिक साझेदार है, लेकिन ट्रंप मात्र इतने से संतुष्ट नहीं। उन्हें भारत के रूप में एक लोकतांत्रिक मित्र राष्ट्र नहीं, बल्कि उनके हिसाब से चलने वाला देश चाहिए। भारत के अमेरिका के बताए रास्ते पर चलने से साफ इन्कार करने के बाद अब यह अमेरिका के एजेंडे में नहीं दिखता कि उसकी मदद से भारत चीन जैसी आर्थिक शक्ति बनकर खड़ा हो। यह अच्छा हुआ कि भारत ने साफ कर दिया कि उसे अमेरिका से व्यापार समझौते की जल्दी नहीं। ट्रंप ने हाल में यह भी कहा था कि भारत एक बड़ा देश है और वह अपने मसले खुद देख लेगा। ध्यान रहे एक अमेरिकी सीनटेर रूसी तेल खरीदने के चलते भारत पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की वकालत कर चुके हैं। पाकिस्तान को शह देते ट्रंप भी भारत-पाकिस्तान सीजफायर के मुद्दे को भी जब तब व्यापार से जोड़ते रहते हैं। इसके पीछे उनका भारत के लिए यही संदेश है कि अगर टैरिफ जैसे मुद्दों पर भारत ने अमेरिका की बात नहीं मानी तो उसे पाकिस्तान के मोर्चे पर और दिक्कतें झेलनी पड़ेंगी। यदि बांग्लादेश में भी अमेरिका लगातार इस्लामिक कट्टरपंथियों को बढ़ावा दे रहा है तो भारत को परेशान करने के लिए ही। इन परिस्थितियों में रूसी विदेश मंत्री द्वारा प्रस्तावित रूस, चीन और भारत का त्रिकोण अब प्रासंगिक लगता है। चीन भी अब इसे लेकर सजग हो रहा है। भारत और चीन के रिश्तों में बर्फ पिघलती देखी जा सकती है। हाल में शंघाई सहयोग संगठन के मंच पर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी की मुलाकात के बाद आए चीनी विदेश मंत्रालय के बयान में उल्लेख हुआ कि दोनों देश एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी न होकर साझेदार हैं।

यह भी पढ़ें : उत्तराखंड पंचायत चुनाव पर संशय बरकरारः 27 जून को होगी हाईकोर्ट में सुनवाई

Next Post

बड़ी खबर : उत्तराखंड पंचायत चुनाव पर लगी रोक को हाईकोर्ट ने हटाया, चुनावी शेड्यूल में होगा मामूली फेरबदल, जुलाई में ही संपन्न होंगे चुनाव

बड़ी खबर : उत्तराखंड पंचायत चुनाव पर लगी रोक को हाईकोर्ट ने हटाया, चुनावी शेड्यूल में होगा मामूली फेरबदल, जुलाई में ही संपन्न होंगे चुनाव नैनीताल/मुख्यधारा हाईकोर्ट में आज हुई सुनवाई के बाद उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पर कोर्ट […]
c 1 9

यह भी पढ़े