वाह री त्रिवेंद्र सरकार! गैरों पर करम, अपनों पर सितम…!!!

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‘आवा अपणु घौर’ जैसे स्लोगन देने वाले  संकटकाल में प्रवासी उत्तराखंडियों को रात के अंधेरे में छोड़ रहे दूसरे प्रदेशों में 

देहरादून।  लॉकडाउन में उत्तराखण्ड सरकार का दोहरा चरित्र साफ नजर आया है। एक तरफ सरकार ने गुजरात के तकरीबन डेढ़ हजार लोगों को अहमदाबाद पहुंचाने के लिये पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन दूसरी ओर गुजरात में फंसे उत्तराखण्ड के लोगों की कोई सुध नहीं ली।

एक धार्मिक आयोजन के लिये हरिद्वार पहुंचे गुजारात के यात्रियों को उनके घर पहुंचाने के लिये सरकार ने गुपगुप तरीके से वीआईपी व्यवस्था कराई। राज्य के बसों के बेड़े से लग्जीरियस बसों को सेनेटाइज कर यात्रियों को उनसे अहमदाबाद पहुंचाया गया।

बताया जा रहा है कि इसकी पूरी जानकारी विभाग के मंत्री यशपाल आर्य तक को नहीं दी गई। सरकार ने यह तत्परता इसलिये दिखाई, क्योंकि जिस व्यक्ति के आयोजन में शामिल होने ये लोग हरिद्वार आये थे, वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी बताये जा रहे हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जो 45 बसें गुजरात गईं, वो बसें वहां से खाली उत्तराखण्ड लौटीं।

उत्तराखण्ड परिवहन का लोगो देखकर कुछ लोग उनमें चढ़े तो उन्हें हरियाणा बार्डर पर रात के अंधेरे में बीच रास्ते में उतार दिया गया। सवाल यह नहीं है कि गुजरात के यात्रियों को वीआईपी अंदाज में उत्तराखण्ड सरकार ने अहमदाबाद सुरक्षित पहुंचाया। सवाल यह है कि गुजरात के लोगों को घर पहुंचाने में दिखाई उतनी तत्परता वहां फंसे उत्तराखण्ड के लोगों को सकुशल घर लाने में क्यों नहीं दिखाई गई? जबकि हालात यह हैं कि गुजरात में भी उत्तराखण्ड के हजारों लोग भुखमरी की स्थिति में हैं, जो वहां से विभिन्न माध्यमों से मदद की गुहार लगा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड सरकार को इसकी जानकारी नहीं है। सरकार चाहती तो जिन बसों से यात्रियों को गुजरात पहुंचाया गया, उन्हीं बसों से उत्तराखंडियों को घर लाया जा सकता था।

विडम्बना देखिये कि इस तरीके की योजना बनना तो दूर उत्तराखण्ड की डिपो की बसें देखकर जो 52 यात्री उनमें चढ़े भी, लेकिन जब हरियाणा पुलिस उन्हें रास्ते में बस से उतार रही थी तो बसों के ड्राइवर-कंडक्टरों के दूरभाष पर आग्रह करने पर भी उत्तराखण्ड परिवहन विभाग के उच्च अधिकारियों ने उनकी मदद से इंकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उत्तराखंड के वे 52 लोग आज भी भूखे प्यासे पैदल घरों की ओर आ रहे हैं।

अब यह सवाल उठ रहा है कि सरकार, प्रवासी उत्तराखंडियों को लेकर इतनी संवेदनहीन क्यों है? तमाम मौकों पर उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रवासियों से राज्य के विकास में सहयोग की अपील की जाती रही है।

रिवर्स पलायन की बातें करते हुये मुख्यमंत्री ‘आवा अपणु घौर’ जैसे स्लोगन देते रहे हैं। इस तरीके के स्लोगन ऐसे में बोमानी साबित होते हैं।

यहां काबिलेगौर है कि जिन लग्जीरियस बसों को गुजरातियों को छोड़ने अहमदाबाद भेजा गया, उनके सेनेटाइजेशन से लेकर ईंधन का पूरा खर्च त्रिवेन्द्र सरकार ने उठाया। उनके चालक और परिचालकों ने भूखे पेट सरकार के इस गुप्त मिशन को अंजाम दिया।

जब इस बारे में परिवहन मंत्री यशपाल आर्य से बात की गई तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि- “अधिकारियों ने इस प्रकरण की जानकारी मुझे नहीं दी। खुद मुझे गुजरात में फंसे कई उत्तराखण्डी भाईयों के फोन आये थे। मुझे पता होता तो वहां फंसे लोग इन बसों से वापस अपने घर आते। मैं इस सम्बंध में विभाग के अधिकारियों से जवाब तलब करूंगा।”

(साभार: दीपक फर्सवाण)

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