यमकेश्वर क्षेत्र में काला कानून थोपने की तैयारी में राजाजी पार्क प्रशासन

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यमकेश्वर क्षेत्र के कुछ हिस्से को राजाजी टाइगर रिजर्व में सम्मिलित कर यहां इको सेंसेटिव जोन घोषित करने की तैयारी चल रही है। इस खबर से स्थानीय लोगों में जबरदस्त आक्रोश है और लोग सेंसेटिव जोन घोर विरोध कर रहे हैं।
  भारतीय जनता पार्टी के जिला सचिव नरेंद्र सिंह कहते हैं कि यदि यमकेस्वर क्षेत्र का कुछ हिस्सा राजाजी टाइगर रिजर्व के कोर जोन बफर जोन और अब ईको सेंसेटिव जोन से घिर जायेगा तो यहां पर व्यवसाय करना असंभव हो जाएगा। ऐसे में जो गांव सड़क से अछूते हैं और जहां विकास की संभावनायें नजर आ रही हैं वे हमेशा पार्क के कड़े कानूनों की आड़ में विकास से अछूते ही रह जायेंगे। यहां के निवासी न कृषि कर सकेंगे न पशु पालन ही। ऐसे में लोगों पर हर चीज में पार्क भारी पड़ेगा।
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पूर्व सैनिक एवं समाजसेवी सुदेश भट्ट ‘दगड़्या’ उत्तरकाशी क्षेत्र का उदाहरण देकर तर्क देते हुए कहते हैं कि यदि यहां इको सेंसेटिव जोन घोषित हो जाएगा तो फिर लोगों को न तो घर बनाने को लकड़ी मिलेगी न पत्थर उठा सकेंगे न पशुओं के लिए चारा पत्ती ही मिलेगी। इसके अलावा अपनी ही सड़क पर यदि किसी ने जोर का हार्न भी बजा दिया तो आप वन अधिनियम के तहत जंगली जानवरों के जीवन में खलल डालने के दोषी बनाकर मुकदमेबाजी ही झेलते रहेंगे। यहां तक कि यदि इस क्षेत्र में मानवीय हलचल के चलते सरकार को लगेगा कि यहां के निवासियों के कारण जंगली जानवरों के जीवन पर असर पड़ रहा है तो बेशक वे गांव हमारी जंगल से बहुत दूर ही क्यों न हो, पर सरकार उन गांवों को भी भविष्य में तत्काल विस्थापन करवा या जबरन पलायन करवाने का फरमान जारी कर यहां के वाशिंदों से अधिक महत्व अपने जंगली जानवरों को देगी तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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पाठकों को यह बताना आवश्यक है कि यमकेस्वर क्षेत्र के युवाओं ने यहीं पर रोजगार शुरु कर अन्य युवाओं को भी रोजगार उपलब्ध करवाकर यहां पर काफी हद तक पलायन पर अंकुश लगाने की दिशा में सार्थक प्रयास किये हैं।
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यदि इस क्षेत्र में यह कानून लागू होता है तो सबसे अधिक असर यहां के गांवों पर पड़ने के साथ ही पर्यटन और तीर्थाटन से जुड़े व्यवसायी गांवों में अपनी रोजी रोटी में लगे घोड़े खच्चर वाले रोजमर्रा की दुकानों वाले दुकानदार कृषक पशुपालक वाहन चालक मकान बनाने वाले मिस्त्री कारपेंटर व तमाम मानवीय गतिविधियां व स्थानीय निवासियों के आय के स्रोत सब धीरे धीरे वन्य कानून के प्रभाव से लुप्त हो जायेंगे। परिणाम स्वरूप तंग आकर स्थानीय लोगों को पलायन करने को मजबूर होना पड़ सकता है।
ये गांव होंगे प्रभावित
 यदि दिउली या तौलसारी सेंसेटिव जोन में आता है तो उसके दस किमी की जद में आने वाले गांव सेंसेटिव जोन की अंतिम सीमा होगी। जैसे दिउली से दस किमी मे जुलेडी पैंय्या भैल्डुंग कुमरांणा उमडा कंडवाल गांव सिंदुडी फल्दाकोट कुकरेती धार पातली डौंर बिनक ईसके बीच के सारे वो अघोषित गांव, जो सूची में नहीं हैं और तौलसारी से दुबडा गुजराडी खेडा बासबा मागथा बूंगा मुसराळी बीरकाटल उधर टोला दलमोगी उड्डा नौगांव गहली गणक्या आने वाले 15-20 साल बाद पूर्ण रुप से राजा जी पार्क के वन्य जीवों के सुरक्षित (reserv) पार्क के रुप मे जाने जायेंगे।
 उधर रत्तापानी से दस किमी ढांगू की तरफ नैम्वांण बिजनी क्वाट माळा पलेल गांव नौडखाल नैल तक पूरा जद में आ जायेगा। तलांई मराल मौन डौबरा आमडी ग्यौंथा तौली भादसी सुनार धार व आस पास के गांव बन कानून की पीडा आज भी झेलने को मजबूर हैं।
 इस मामले में आगामी 31 अगस्त को चौरासी कुटी में
वन विभाग पार्क प्रशासन की सुनवाई के दौरान स्थानीय क्षेत्रवासी ने घेराव  करने जा रहे हैं। स्थानीय जागरूक लोगों ने समस्त क्षेत्रवासियों से इस कड़े कानून को क्षेत्र में लागू न होने देने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया है। अब देखना यह होगा कि क्षेत्रवासियों के विरोध के बावजूद यह कानून यमकेश्वर क्षेत्र में थोप दिया जाता है या नहीं!

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