पर्यावरण दिवस विशेष: पौड़ी गढ़वाल के पर्यावरण प्रेमी जेपी भट्ट ने पशु-पक्षियों की सेवा में किया जीवन समर्पित। गरुड़चट्टी में लिया गंगाजी के समक्ष संकल्प

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वर्षों से कर रहे हैं नि:स्वार्थ भाव से पशु-पक्षियों की सेवा

मामचन्द शाह

आज पर्यावरण दिवस पर हम आपको एक ऐसे पर्यावरण प्रेमी से रूबरू करवा रहे हैं, जो महज पांच जून को ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी रोजाना की जीवनचर्या में पर्यावरण को शामिल कर दिया है। पशु-पक्षियों की सेवा में वे इतने रम गए हैं वे उन्हें इंसान के रूप में देखते हैं। यह शख्सियत हैं पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर क्षेत्र के जेपी भट्ट।
यूं तो जेपी भट्ट का पर्यावरण व पशु-पक्षी प्रेम किसी से छिपा नहीं है, लेकिन फिर भी आज पर्यावरण दिवस के अवसर पर उनके पर्यावरण के इस अनोखे प्रेम को उत्तराखंड के आम जनमानस के सम्मुख पहुंचाना आवश्यक हो जाता है। यही नहीं उनकी प्रेरणा को समाज के हर तबके में इसलिए पहुंचाना भी जरूरी हो जाता है, जब कोरोना का संकट गहराया हुआ है, पशु-पक्षी भूख-प्यास से जूझ रहे हैं और देश में एक बड़ी निर्मम घटना घटी है, जब केरल जैसे शिक्षित राज्य में एक गर्भवती हथिनी को धोखे से बम से उड़ा दिया गया हो, ऐसे में जेपी भट्ट की जीव-जंतुओं के प्रति निश्छल प्रेम से निश्चित ही समाज को नई प्रेरणा मिल सकती है। इसी उद्देश्य के साथ मुख्यधारा भी जेपी भट्ट के पर्यावरण, पशु-पक्षी प्रेम को अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।
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जेपी भट्ट के मन में बचपन से ही अगाध प्रेम था, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन में भूख-प्यास से जूझ रहे पशु-पक्षियों ने उन्हें इस सेवा में पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया। जब उन्होंने देखा कि मार्च अंत में लॉकडाउन के बाद से सब कुछ बंद हो गया है और पशु सड़कों पर भूख-प्यास से तरस रहे हैं तो उन्हें भीतर से यह बात झकझोर गई। इसी के साथ उन्होंने गंगा तट पर जाकर मां गंगा के सम्मुख संकल्प लिया कि उन्होंने अपना शेष जीवन पशु-पक्षियों की सेवा के लिए समर्पित कर लिया है।

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कोरोना महामारी के चलते इसकी शुरुआत से ही जेपी भट्ट बेजुबान जानवरों की नि:स्वार्थ भाव से सेवा में लगे हैं। जेपी भट्ट ने एक ऐसी मुहिम शुरू की है, जो इससे पहले कभी नहीं देखी गई। अगर कहीं देखी भी गई हो तो वह मात्र एक फोटो सोशल मात्र तक ही रहे हैं। उसके बाद वे लोग कहीं नहीं दिखाई देते।
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आवारा भटक रही गौमाताओं की दशा देख भट्ट ने उनके रहने के लिए एक जगह बनाने का बीड़ा उठाया है, जो सभी अवारा पशुओं का ठिकाना बनेगा। एक जगह सारी गौमाता चारा खा सकती हैं।
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अगर उत्तराखंड सरकार भी पशु प्रेमी जेपी भट्ट जी इस मुहिम में सहयोग करे तो गौ माता घर घर और सड़कों पर भटकने को मजबूर नहीं होगी। उन गौमाता कि दुर्दशा न हो, क्योंकि इस बीच महामारी के चलते कई गौ माताओं की मृत्यु हो चुकी है।
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इसे जेपी भट्ट की संवेदनशीलता ही कहा जाएगा कि चारे के साथ ही प्यास से तड़प रहे पशुओं के लिए सड़कों पर उन्होंने टब तक लगवा दिए थे। यही नहीं बंदरों, लंगूरों, कुत्तों, गायों एवं तमाम आवास घूम रहे पशुओं को देखते ही जेपी भट्ट अपनी गाड़ी से फौरन उतर जाते हैं और हमेशा की तरह उनकी गाड़ी में इनके लिए कुछ न कुछ रखा होता है। वे उन्हें कुछ खिलाकर ही आगे बढ़ते हैं।
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इस संबंध में पशु प्रेमी जेपी भट्ट कहते हैं कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार गौमाता में कई देवी-देवताओं का वास होता है, लेकिन दुखद है कि हम लोग इसी गौ माता को सड़कों पर भूख-प्यास से तड़पने के लिए छोड़ देते हैं। हालांकि जब तक गाय दूध देती हैं, तब तक उनकी खूब सेवा होती है, लेकिन जब वह दूध देना बंद कर देती हैं तो लोग उससे नाता तोड़ देते हैं और उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। कई बार वाहनों की टक्कर में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है। वह कहते हैं कि उन्हें जो सुख पशु सेवा करने में मिलता है, वह अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यही कारण है कि उन्होंने स्वयं को जीवन अब पशु सेवा के लिए समर्पित कर दिया है।

यमकेश्वर क्षेत्रवासियों ने सरकार से मांग की है कि पशु प्रेमी जेपी भट्ट की इस मुहिम में सहयोग किया जाए, जिससे उनके प्रयासों से अधिक से अधिक पशुओं की सेवा की जा सके।
इस संबंध में क्षेत्र पंचायत सदस्य सुदेश भट्ट कहते हैं कि लॉकडाउन में सड़कों पर पशु भूख प्यास से जूझ रहे थे, अगर जेपी भट्ट की ओर से उनके चारे व पानी का इंतजाम नहीं किया गया होता, तो आज ये पशु दुनिया को छोड़ चुके होते। उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों की भी वह खूब सेवा करते हैं और उन्हें आते-जाते जरूर कुछ चीजें खिलाते हैं। यही कारण है कि जब वे जेपी भट्ट को देखते हैं तो लंगूर व बंदर भी उनसे लिपट जाते हैं।
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एक नजर जेपी भट्ट के बारे में
जेपी भट्ट यमकेश्वर क्षेत्र के बूंगा गांव के निवासी हैं। वह पंजाब बिजली विभाग में नौकरी करते थे। वहां से सेवानिवृत्ति के बाद वह सीधे गांव चले आए। वह क्षेत्र में एक होटल चलाते हैं। लेकिन बचपन से ही पशुओं के प्रति प्रेम उन्हें रोक नहीं पाता है। उन्होंने इस दौरान गंगा तट गरुड़चट्टी में संकल्प लिया है कि उन्होंने अपना शेष जीवन पशु-पक्षियों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उनका बेटा एमबीबीएस डॉक्टर है, जो वर्तमान में श्रीनगर गढ़वाल में कोरोना योद्धा के रूप में सेवा कर रहा है। वर्तमान में श्री भट्ट करीब 55 वर्ष के होंगे। उनकी पशुओं के प्रति अपारा श्रद्धा व पे्रम को देख क्षेत्रवासी भी उनके कायल हैं। उनके इस प्रयास से पूरा पौड़ी गढ़वाल में उनकी खूब सराहना हो रही है, वहीं समूचे उत्तराखंड के लिए वे सच्चे पर्यावरण प्रेमी के रूप में एक प्रेरणास्रोत हैं। मुख्यधारा टीम भी ऐसे पर्यावरण व पशु प्रेमी को सल्यूट करती है।

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