पहाड़ के लिए खूनी कानून है विकास प्राधिकरण, जानिए कड़वी सच्चाई

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एकजुट होकर विरोध करने का है समय

संतोष फुलारा

पर्वतीय राज्य के लिये संघर्ष करते समय क्या किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब विकास प्राधिकरण जैसे काले कानून को हमारे उपर जबरन थोपा जायेगा जो समय समय पर मौत का कारण भी बनेगा।

दरअसल विकास के नाम पर बागेश्वर, अल्मोड़ा जैसे अन्य ठेठ पर्वतीय जिलों में विकास प्राधिकरण को जिस तरीके से लागू किया जा रहा है, उससे लाभ कम और नुकसान ज्यादा होता नजर आ रहा है। दुख की बात तो यह है कि एक महीने में दो लोगों की मौत पर न तो हमारे विधायकों, जनप्रतिनिधियों का दिल पसीजा है और न मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का।

यहां उन अधिकारियों को दोष इसलिये नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभानी है। उनकी नौकरी तभी बची रहेगी, जब वे नियमों का पालन करेंगे। विरोध और आक्रोश उन नेताओं पर है, जो जनता का दुख और दर्द की परवाह नहीं करते। विधानसभा और संसद में बैठकर जनता की आवाज नहीं उठाते। शिक्षित समाज को सोचना होगा कि सड़क से लड़ाई शुरू होकर विधानसभा और संसद तक तो पहुंचती है, लेकिन संसद और विधानसभा के अंदर वही होता है, जो सरकार चाहती है ना कि जनता। इसलिये चोट कहां करनी है, यह पहले समझना और तय करना होगा।

मैंने पिछले 16 साल देहरादून में गुजारे हैं। देहरादून और हल्द्वानी जैसे बड़े शहरों में इन कानूनों की सख्त जरूरत है। बल्कि और कड़े कानून इन शहरों के लिये तैयार होने चाहिये, मगर उस ओर सरकार का ध्यान नहीं हैं।

सोचिये पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासी जो कई पुश्तों से यहां रह रहे हैं कितनों के नाम अपनी जमीन है। आधी से ज्यादा ग्रामीणों की जमीन या तो अदली-बदली की होगी या कागज के टुकड़े पर अंगुठा लगाकर अपने नाम की हुई होगी।

ऐसे में प्राधिकरण उन्हें एक न एक दिन अवश्य डंस लेगा, जिसमें किसी न किसी की मौत निश्चित है। इसलिये जरूरी है कि प्राधिकरण हटाओ मोर्चा को जनता की आवाज के रूप में मजबूत किया जाए। इसमें पार्टी और विचारधारा नहीं देखी जानी चाहिये। मेरी ओर से जिला विकास प्राधिकरण के काले कानून का पुरजोर विरोध है, आगे आपको तय करना है..!

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